हिमालय प्रहरी

बिल्डिंग और कॉलोनियां में दिखा दिए खेत, बंजर जमीन पर भी लहलहा दी गेंहू की फसल

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लखनऊ। सवाल बड़ा मौंजू है और सीधा सा है। क्या सड़क पर गेंहू पैदा हो सकता है? अगर सड़क यूपी में है तो यहां यह कमाल भी हो सकता है। जी हां चौंकिए नहीं ! इस बार यह कारनामा यहां हो चुका है। इस बार सरकारी खऱीद केन्द्रों पर गेंहू बेचने के दौरान किए गए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन में लगे खेतों की खतौनी तो कुछ ऐसा ही बतायी है। इसी तरह रेशम विभाग की बंजर जमीन पर भी 10 लाख का गेंहू बेचा दिखाया जा रहा है। रचपुरा टांडा के किसान सुच्चा सिंह ने खेत बटाई पर दिया ही नही और न फसल सरकारी खऱीद केन्द्रों पर बेची पर सरकारी कागजों में सुच्चा सिंह के खेतों पर रामनारायण नाम के शख्स ने बटाई की और 55 कुंतल गेंहू सरकार को बेचा। ऐसे में सवाल है कि गेहूं की खरीद में कहीं घोटाला तो नहीं हुआ है? किसान नेता राकेश टिकैत ने आरोप लगाया है कि फर्ज़ी कागज़ लगाकर गेहूं की ख़रीद दिखाई गई है और किसानों का पैसा कोई और खा गया है।

इस बार उत्तर प्रदेश में गेंहू खरीद केन्द्रों पर एमएसपी के नाम पर सिर्फ रामपुर रचपुरा टांडा में ही बिचौलियों का बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। दरअसल खरीद केन्द्रों पर गेंहू बेचने के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन के दौरान उस खेत की खतौनी भी लगानी होती है जहां गेंहू बोया गया था। इसके बाद एसडीएम इसका सत्यापन करते हैं और तब जाकर किसानों के खाते में एमएसपी का पैसा आता है। इस बार बिचौलियों ने इस पर बड़ा फर्जीवाड़ा कर दिया है।

किसानों का दो टूक कहना है कि जब फसल खऱीद केन्द्रों पर बेची ही नही तो एमएसपी का क्या मतलब है? बिचौलियों ने तो सड़कों पर गेंहू की पैदावार दिखाकर बेच डाली। रेशम विभाग की जमीन पर 10 लाख का गेंहू दिखाते हुए बेच दिया गया। रजिस्ट्रेशन में फर्जी खतौनी लगाकर गेंहू बेचा दिया गया। ऐसे में सवाल यह है कि बेचा हुआ गेंहू बोया कहां गया था ? रामनारायण ने किसी दीपक गोयल की जमीन पर गेंहू बोया पर बिचौलिए ने खतौनी में सुच्चा सिंह का खेत दिखा दिया । सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक यह गेंहू 1975 रुपए कुंतल पर खऱीदा गया जबकि किसानों का कहना है कि हमें 1850 रुपए कुंतल के हिसाब से पैसा मिला। इसके बाद बिचौलियों का पूरा खेल समझ में आ जाता है।

बिचौलियों ने सरकारी तंत्र की मिलीभगत से गेंहू खऱीद केन्द्र पर किसानों का गेंहू एमएसपी से कम पर खऱीद लिया। इसके बाद खरीदे गए गेंहू को फर्जी खतौनी लगाकर सरकारी खरीद केन्द्रों पर बेच दिया गया। वैसे इस दौरान जांच और सत्यापन जैसी प्रक्रिया भी होती हैं पर सारा तय-तोड़ हो चुका था ऐसे में सत्यापन जैसी औपचारिकता भी बिचौलिए के हिसाब से कर दी दी गयीं। इन्हीं सब बातों से डरे किसान लंब समय से आंदोलन कर रहे हैं। सरकार कहती है एमएसपी थी,एमएसपी है और एमएसपी रहेगी पर यहां एमएसपी का फायदा किसानों को नही बिचौलियों ने उठाया है। यह कहानी तो सिर्फ रचपुर टांडा गांव की है। यूपी के दूसरी जिलों में क्या हुआ होगा इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

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