गुजरात से न्याय व्यवस्था की विडंबना को दर्शाता एक अत्यंत हृदयविदारक मामला सामने आया है। एक पुलिस कांस्टेबल को मात्र 20 रुपये की कथित रिश्वत के आरोप में अपनी जिंदगी के तीन दशक अदालतों के चक्कर काटने में बिताने पड़े। अंततः जब हाई कोर्ट ने उन्हें निर्दोष पाया, तो उस खुशी को जीने के लिए उनके पास केवल कुछ ही घंटे बचे थे।
⏳ न्याय की लंबी और थकाऊ यात्रा (1996 – 2026)
बाबूभाई प्रजापति के लिए निर्दोष साबित होने का सफर बेहद संघर्षपूर्ण रहा:
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1996: अहमदाबाद में तैनात कांस्टेबल बाबूभाई पर ₹20 रिश्वत लेने का आरोप लगा।
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1997-2003: चार्जशीट दाखिल हुई और गवाहों की लंबी सुनवाई प्रक्रिया चली।
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2004: सेशन कोर्ट ने उन्हें दोषी मानकर 4 साल की जेल और ₹3,000 जुर्माने की सजा सुनाई।
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2026: सजा के खिलाफ की गई अपील 22 वर्षों तक हाई कोर्ट में लंबित रही। 4 फरवरी 2026 को गुजरात हाई कोर्ट ने उन्हें पूरी तरह निर्दोष घोषित किया।
💔 “कलंक मिट गया…” और फिर खामोशी
हाई कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष के पास ठोस सबूत नहीं थे और गवाहों के बयानों में विरोधाभास था। फैसले के बाद बाबूभाई ने भावुक होकर कहा था, “मेरी जिंदगी से कलंक मिट गया, अब भगवान मुझे ले भी जाएं तो दुख नहीं होगा”।
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दुखद अंत: कोर्ट से सम्मान वापस पाने के अगले ही दिन, दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गई।
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विरासत: उनके वकील नितिन गांधी ने उन्हें मुआवजे के लिए आवेदन करने की सलाह दी थी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
📝 मामले का गहरा संदेश
यह घटना भारतीय न्याय प्रणाली में अत्यधिक देरी और झूठे आरोपों से तबाह होती जिंदगियों का एक बड़ा उदाहरण है। बाबूभाई ने 30 साल तक जिस ‘दाग’ को धोने के लिए संघर्ष किया, उसके हटने के बाद वे एक दिन का सुकून भी नहीं देख पाए।
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