हिमालय प्रहरी

45 मिनट तक समझाते रहे जज, फिर भी मां से बात करने को राजी न हुआ बेटा, वजह चौंकाने वाली

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सुप्रीम कोर्ट के जज उसे मनाते रहे. बारबार समझाया कि एक बार अपनी माँ से बात तो कर ही लो. इसके बाद भी बेटा डिगा नहीं और बार बार यही कहता रहा कि मैं अपनी माँ से मिलना तो दूर बात तक नहीं करना चाहता हूँ और मेरे इस फैसले के पीछे एक बुरी दास्ताँ है, और मैं बात करके उस दर्दनाक दिनों को याद नहीं करना चाहता, जो मुझे बचपन में माँ से मिले थे. सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति सूर्यकांत की पीठ ने मातापिता और बेटे से कक्ष में 45 मिनट से अधिक समय तक बात करके इस बेटे को अपनी मां से बात करने के लिए मनाने की कोशिश की, लेकिन नाकामयाबी हाथ लगी और इसके साथ ही बेटे ने सुप्रीम कोर्ट से साफ़ कह दिया कि वह बात नहीं करेगा. और इसकी वजह भी बताई.

सुप्रीम कोर्ट की कोशिश भी नाकाम
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रहा था जिसमें पति अपनी पत्नी से पिछले 20 साल से तलाक चाह रहा था, लेकिन तलाकशुदा होने के तमगे से बचने के लिए पत्नी तलाक नहीं दे रही थी, जबकि वह अपने पति से 20 साल से अलग रह रही है. इस दम्पति का एक बेटा भी है, जो सुप्रीम कोर्ट में मौजूद रहा उसने अपनी मां से मिलने से इंकार कर दिया.

बेटे ने सुनाई दास्ताँ
इस बेटे की उम्र अब 27 साल है. इस शख्स ने सुप्रीम कोर्ट को 20 साल पहले की ऐसी दास्ताँ सुनाई जिसे सुन सुप्रीम कोर्ट के जज भी चुप हो गए. अपने ‘‘दर्दनाक बचपन’’ को याद करते हुए सुप्रीम कोर्ट को बताया ‘‘मुझे पीटा गया. मैं घंटों शौचालय बाथरूम में बंद रहा. मैं अपनी मां से बात नहीं करना चाहता.’’

बचपन याद कर सिहर जाता हूं
मां का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील ने जब पीठ से कहा कि उसे अपने बेटे से बात करने की अनुमति दी जाए क्योंकि वह अपने पिता के साथ रहता है, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने बेटे को अपनी मां से बात करने को कहा. अदालत में व्यक्तिगत रूप से मौजूद 27 साल वर्षीय व्यक्ति ने अदालत को बताया कि उसकी मां सात साल की उम्र में उसे पीटती थी और उसे बाथरूम में बंद कर देती थी. अपने दर्दनाक बचपन को याद करते हुए, बेटे ने कहा, ‘‘अपनी मां से बात करके मेरी दर्दनाक यादें वापस लौट आएंगी. कौन सी मां अपने सात साल के बेटे को पीटती है जब वह बाहर जाती थी तो मुझे घंटों बाथरूम में बंद कर दिया जाता था. मेरे पिता ने कभी मुझ पर हाथ नहीं उठाया.’’

महिला को कलंक का डर, इसलिए…
मां के वकील ने कहा कि बेटा सोची समझी कहानी बता रहा है और ऐसा कुछ नहीं हुआ है. पीठ ने कहा कि वह 27 साल का युवक है, उसकी अपनी समझ है और उसे सोची समझी कहानी बताने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है. पति की ओर से पेश अधिवक्ता अर्चना पाठक दवे ने कहा कि बच्चे की मां ने अपने बेटे का संरक्षण लेने के लिए कभी अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया. दवे ने कहा कि उनका मुवक्किल केवल यह चाहता है कि इस विवाद को समाप्त किया जाए और अनुच्छेद 142 के तहत शक्ति का प्रयोग करके अदालत द्वारा तलाक दिया जाए. इस व्यक्ति की मां के वकील ने कहा कि वह तलाकशुदा होने के कलंक के साथ नहीं जीना चाहती. इस जोड़े ने 1988 में शादी की थी और 2002 में पति ने क्रूरता के आधार पर तलाक मांगा और अलग रहने लगे

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