अमेरिका और इजरायल के बीच का यह अटूट रिश्ता केवल कूटनीति नहीं, बल्कि एक गहरी रणनीतिक और ऐतिहासिक साझेदारी है। जैसा कि आपने उल्लेख किया, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में यह दोस्ती और भी मुखर होकर उभरी है। आपने जो बिंदु रखे हैं, वे इस “अनसिंकेबल एयरक्राफ्ट कैरियर” (विमान वाहक पोत) वाली उपमा को पूरी तरह चरितार्थ करते हैं।
यहाँ इस साझेदारी के कुछ और महत्वपूर्ण पहलुओं का विश्लेषण दिया गया है, जो 2026 के वैश्विक परिदृश्य में इसकी अहमियत को और स्पष्ट करते हैं:
इजरायल का अस्तित्व अमेरिका के लिए मध्य पूर्व में उसकी अपनी ताकत का विस्तार है। इसके पीछे के प्रमुख कारण कुछ इस प्रकार हैं:
1. हथियारों की ‘लाइव लेबोरेटरी’ और आर्थिक चक्र
आपने सही कहा कि 4 अरब डॉलर की सहायता अंततः अमेरिकी अर्थव्यवस्था में ही वापस आती है।
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फीडबैक लूप: जब इजरायल गाजा या लेबनान के मोर्चे पर F-35 या पैट्रियट मिसाइल सिस्टम का उपयोग करता है, तो उससे मिलने वाला डेटा अमेरिका के लिए अमूल्य है। यह दुनिया का एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ अमेरिकी तकनीक का “कॉम्बैट टेस्ट” (युद्ध परीक्षण) होता है।
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आयरन डोम का फायदा: अमेरिका ने आयरन डोम में निवेश किया है और अब इसकी तकनीक का उपयोग खुद अमेरिकी सेना अपनी चौकियों की सुरक्षा के लिए कर रही है।
2. ‘मोसाद’ और अमेरिकी सुरक्षा का कवच
मोसाद की पहुँच उन जगहों पर है जहाँ CIA या MI6 भी नहीं पहुँच सकतीं।
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आतंकवाद पर लगाम: ईरान के परमाणु कार्यक्रम से लेकर सीरिया और यमन के विद्रोही गुटों तक, इजरायल जो खुफिया जानकारी देता है, वह अमेरिका को अपनी धरती पर 9/11 जैसे हमलों को रोकने में मदद करती है।
3. ‘स्टार्टअप नेशन’ और सिलिकॉन वैली का संगम
इजरायल की तकनीक के बिना आधुनिक कंप्यूटिंग की कल्पना करना मुश्किल है।
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टेक दिग्गजों का आधार: इंटेल का सबसे आधुनिक चिप डिजाइन सेंटर इजरायल में है। अगर इजरायल अस्थिर होता है, तो एप्पल, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी अमेरिकी कंपनियों की सप्लाई चेन और इनोवेशन की रफ्तार थम जाएगी।
ऐतिहासिक आधार: यहूदी प्रतिभा ने बनाया अमेरिका को ‘सुपरपावर’
आपने अल्बर्ट आइंस्टीन और हेनरी किसिंजर जैसे नामों का जिक्र कर इस बात को पुख्ता किया है कि अमेरिका को महाशक्ति बनाने वाली बौद्धिक पूंजी का एक बड़ा हिस्सा यहूदी प्रवासियों से आया है।
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परमाणु युग की शुरुआत: आइंस्टीन और लियो ज़िलार्ड के बिना ‘मैनहट्टन प्रोजेक्ट’ संभव नहीं होता। यानी अमेरिका की परमाणु श्रेष्ठता की नींव यहूदी वैज्ञानिकों ने ही रखी थी।
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अंतरिक्ष की रेस: ‘ऑपरेशन पेपरक्लिप’ के तहत आए वर्नर वॉन ब्रौन ने अमेरिका को चंद्रमा पर पहुँचाया। यहूदियों को शरण देना अमेरिका के लिए एक ऐसा निवेश साबित हुआ जिसने उसे विज्ञान, सिनेमा (हॉलीवुड) और अर्थव्यवस्था में दुनिया का ‘बॉस’ बना दिया।
डोनाल्ड ट्रंप और 2026 के मध्यावधि चुनाव का गणित
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में इजरायल की हार या जीत सीधे तौर पर ट्रंप के राजनीतिक भविष्य से जुड़ी है:
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इवेंजेलिकल वोट बैंक: अमेरिका में एक बड़ा ईसाई वर्ग (Evangelicals) मानता है कि इजरायल का समर्थन करना ईश्वरीय आज्ञा है। ट्रंप इस वोट बैंक को खोने का जोखिम नहीं उठा सकते।
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AIPAC का प्रभाव: इजरायल समर्थक लॉबी न केवल फंडिंग बल्कि नैरेटिव सेट करने में भी माहिर है।
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ईरान फैक्टर: यदि ट्रंप ईरान के खिलाफ इजरायल को निर्णायक जीत नहीं दिला पाते, तो विपक्ष (डेमोक्रेट्स) उन्हें कमजोर राष्ट्रपति के रूप में पेश करेगा, जिससे मध्यावधि चुनावों में उनकी सीटें घट सकती हैं और महाभियोग (Impeachment) का खतरा मंडराने लगेगा।
निष्कर्ष: जय-वीरू की ये जोड़ी टूटना मुश्किल है
इजरायल के लिए अमेरिका का दुलार केवल भावनाओं पर नहीं, बल्कि ठोस सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक स्वार्थों पर टिका है। अमेरिका के लिए इजरायल वह ‘चेकमेट’ मोहरा है, जिसके बिना वह पूरी दुनिया की बिसात पर अकेला पड़ सकता है।
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