
सवाल अब यह है कि क्या यह महज धार्मिक सहभागिता है या बलराज पासी एक बार फिर अपनी पुरानी राजनीतिक जमीन पर सक्रियता बढ़ाने की तैयारी में हैं?
फिलहाल भाजपा की ओर से काशीपुर विधानसभा सीट पर उनके नाम की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। स्वयं बलराज पासी ने भी इस मौके पर काशीपुर से चुनाव लड़ने की कोई घोषणा नहीं की है। इसलिए उनकी चुनावी दावेदारी को फिलहाल सियासी चर्चा के रूप में ही देखा जा रहा है। लेकिन उनका राजनीतिक इतिहास और काशीपुर से पहले जुड़ चुकी चुनावी चर्चाएं इस मौजूदगी को खास जरूर बना रही हैं।
मोटेश्वर महादेव मंदिर से निकली भव्य कलश यात्रा
काशीपुर में आयोजित द्वितीय श्रीमद्भागवत कथा का शुभारंभ रविवार को भव्य कलश यात्रा के साथ हुआ। श्री मोटेश्वर महादेव मंदिर से शुरू हुई यात्रा दा गोविशन हेरिटेज काशीपुर तक पहुंची। श्रद्धालु धार्मिक उत्साह और भक्ति के वातावरण में यात्रा में शामिल हुए।
आयोजकों के अनुसार कथा का आयोजन 4 अक्टूबर से 10 अक्टूबर 2026 तक परम पूज्य श्री रविनंदन शास्त्री जी महाराज के श्रीमुख से किया जा रहा है।
इसी धार्मिक आयोजन में बलराज पासी ने भी श्रद्धालुओं के साथ सहभागिता की। सामान्य तौर पर धार्मिक आयोजनों में राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र के लोगों की मौजूदगी कोई असामान्य बात नहीं है, लेकिन काशीपुर में पासी की मौजूदगी को लेकर चर्चा इसलिए तेज हुई क्योंकि इस क्षेत्र से उनकी राजनीतिक दावेदारी पहले भी सुर्खियों में रह चुकी है।
राम जन्मभूमि आंदोलन से शुरू हुई पहचान
बलराज पासी का राजनीतिक सफर राम जन्मभूमि आंदोलन के दौर से जुड़ा रहा है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार 1990 में उन्होंने कुमाऊं में राम मंदिर आंदोलन की जिम्मेदारी संभाली थी और आंदोलन के दौरान कारसेवकों के बीच सक्रिय भूमिका निभाई थी।
वर्ष 2020 में अयोध्या में राम मंदिर के भूमि पूजन के समय भी उनके पुराने आंदोलनकारी योगदान का उल्लेख करते हुए उन्हें सम्मानित किए जाने की बात सामने आई थी।
यही दौर था, जब बलराज पासी भाजपा और हिंदुत्व की राजनीति में एक चर्चित युवा चेहरे के रूप में उभरे।
एनडी तिवारी को हराकर संसद पहुंचे थे पासी
राम मंदिर आंदोलन से बनी राजनीतिक पहचान को चुनावी सफलता में बदलने का बड़ा मौका उन्हें 1991 के लोकसभा चुनाव में मिला।
भाजपा ने उन्हें नैनीताल-बहेड़ी लोकसभा सीट से प्रत्याशी बनाया। मुकाबला कांग्रेस के दिग्गज नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी से था।
पासी ने तिवारी को हराकर बड़ा राजनीतिक उलटफेर किया और पहली बार लोकसभा पहुंचे। वह 1991 से 1996 तक सांसद रहे। बाद के चुनावों में भी उन्होंने नैनीताल सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन दोबारा लोकसभा नहीं पहुंच सके।
सांसद के बाद भी खत्म नहीं हुई राजनीतिक सक्रियता
संसद से बाहर आने के बाद भी बलराज पासी भाजपा की राजनीति में सक्रिय बने रहे। वर्ष 2019 में उन्होंने नैनीताल-ऊधमसिंह नगर लोकसभा सीट से पार्टी टिकट के लिए दावेदारी की थी, लेकिन भाजपा ने अजय भट्ट को प्रत्याशी बनाया। पासी ने बाद में पार्टी प्रत्याशी के समर्थन में चुनाव प्रचार करने की बात कही थी।
इसी दौर में उन्हें कैबिनेट मंत्री स्तर का दर्जा भी मिला था। उस समय उन्होंने लोकसभा टिकट की अपनी दावेदारी जारी रहने की बात कही थी।
यानी सांसद बनने के बाद भी उनकी राजनीतिक सक्रियता और संगठन में भूमिका बनी रही।
काशीपुर पहले भी बन चुका है पासी की सियासी चर्चा का केंद्र
बलराज पासी का नाम काशीपुर विधानसभा सीट को लेकर पहले भी चर्चा में आ चुका है। 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले प्रकाशित राजनीतिक विश्लेषणों में उन्हें भाजपा के संभावित दावेदारों में शामिल किया गया था। उस समय काशीपुर में उनके स्थानीय बनाम बाहरी चेहरे को लेकर भी राजनीतिक बहस सामने आई थी।
हालांकि उस चुनाव में भाजपा ने त्रिलोक सिंह चीमा को प्रत्याशी बनाया।
इसके बाद भी काशीपुर की राजनीति में बलराज पासी का नाम पूरी तरह गायब नहीं हुआ। यही कारण है कि अब श्रीमद्भागवत कथा के आयोजन में उनकी मौजूदगी को लेकर एक बार फिर राजनीतिक चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
तराई की राजनीतिक जमीन से रहा है पुराना रिश्ता
बलराज पासी का तराई से संबंध नया नहीं है। 2022 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में उनके तराई में राजनीतिक जमीन तलाशने की गतिविधियों का उल्लेख किया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक उस समय वह अपने राजनीतिक भविष्य की संभावनाओं को लेकर क्षेत्र में सक्रिय थे।
ऐसे में काशीपुर में उनकी मौजूदा मौजूदगी को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या वह फिर से तराई की राजनीति में अपनी सक्रियता बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
क्या भागवत कथा के बाद बढ़ेगी राजनीतिक सक्रियता?
श्रीमद्भागवत कथा में शामिल होना धार्मिक और सामाजिक सहभागिता का हिस्सा है। लेकिन राजनीति में किसी पुराने और चर्चित चेहरे की सार्वजनिक मौजूदगी अक्सर अपने साथ कई सवाल भी लेकर आती है।
काशीपुर में बलराज पासी की मौजूदगी ने भी यही सवाल खड़ा किया है—
क्या पासी सिर्फ धार्मिक आयोजनों के जरिए क्षेत्र से अपना सामाजिक जुड़ाव बनाए रख रहे हैं या आने वाले दिनों में काशीपुर उनकी राजनीतिक गतिविधियों का नया केंद्र बन सकता है?
अभी इसका कोई आधिकारिक जवाब नहीं है।
भाजपा के टिकट पर चुनाव की चर्चा, लेकिन फैसला अभी दूर
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बलराज पासी आने वाले विधानसभा चुनाव में काशीपुर से भाजपा के टिकट की दावेदारी करेंगे?
फिलहाल इस सवाल का कोई आधिकारिक उत्तर सामने नहीं आया है। भाजपा ने काशीपुर से उनके नाम की घोषणा नहीं की है और न ही पासी ने स्वयं अपनी उम्मीदवारी घोषित की है।
इसलिए वर्तमान स्थिति में इसे टिकट की घोषणा या चुनावी दावेदारी के रूप में पेश करना जल्दबाजी होगी। हां, उनके पुराने राजनीतिक रिकॉर्ड और 2022 में काशीपुर से जुड़ी दावेदारी की चर्चाओं के कारण उनकी मौजूदा मौजूदगी को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा जरूर तेज हो गई है।
राम जन्मभूमि से संसद और अब काशीपुर तक…
बलराज पासी की राजनीति का सफर देखा जाए तो इसमें कई पड़ाव रहे हैं—राम जन्मभूमि आंदोलन में सक्रिय भूमिका, 1991 में नारायण दत्त तिवारी को हराकर संसद में पहुंचना, बाद में सरकार में कैबिनेट स्तर का दर्जा हासिल करना और फिर लगातार संगठनात्मक राजनीति में सक्रिय रहना।
अब श्रीमद्भागवत कथा की कलश यात्रा में उनकी मौजूदगी ने काशीपुर में उनके नाम को फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
भागवत कथा में आस्था की यह मौजूदगी क्या आने वाले दिनों में सियासी सक्रियता में बदलती है? क्या पुराने राजनीतिक मैदान काशीपुर में बलराज पासी फिर अपनी जमीन तलाशते नजर आएंगे?
इन सवालों के जवाब फिलहाल भविष्य के गर्भ में हैं। लेकिन इतना जरूर है कि काशीपुर की सियासत में बलराज पासी की दस्तक ने पुराने राजनीतिक सवालों को एक बार फिर जगा दिया है।
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