पुष्कर सिंह धामी ने दोबारा उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली तो उनके साथ कैबिनेट के 8 मंत्रियों ने भी. अब सवाल यह है कि जब कैबिनेट में 11 मंत्रियों का मानक सेट है, तो तीन मंत्री पद खाली क्यों छोड़ दिए गए? 11 की जगह 8 कैबिनेट मंत्रियों को शपथ दिलवाए जाने के पीछे एक खास रणनीति की चर्चा हो रही है और कहा जा रहा है कि इस दांव से भाजपा ने अपने अंदरूनी असंतोष के खतरे को काबू में रखा. वास्तव में यह पहली बार नहीं हुआ है कि सभी मंत्रियों की संख्या से कम मंत्रियों को शपथ दिलवाई गई हो.
खबरों की मानें तो धामी कैबिनेट में तीन मंत्री पदों के लिए किसी को शपथ न दिलवाए जाने का एक्सपेरिमेंट एक खास रणनीति के तहत किया गया है. 2017 में जब भाजपा सत्ता में आई थी, तब भी ऐसा प्रयोग हुआ था. त्रिवेंद्र सिंह रावत के साथ भी 11 की जगह 8 कैबिनेट मंत्री शुरुआत में लिये गए थे और तीन पद खाली छोड़े गए थे. हालांकि बाद में सभी पद भाजपा सरकार को भरने पड़े थे. माना जा रहा है कि कैबिनेट को लेकर अगर कोई असंतोष सामने आया तो इन तीन पदों पर उसे एडजस्ट किया जा सकेगा.
हालांकि इस बारे में अभी कोई विधायक सीधे और खुलकर बात नहीं कर रहे हैं, लेकिन भाजपा के भीतरी सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि तीन मंत्री पद खाली छोड़ने से अभी पार्टी में कोई भी विधायक सीधे तौर पर असंतोष नहीं दिखा सकेगा क्योंकि गुंजाइश रखी गई है. वहीं, पिथौरागढ़ ज़िले की डीडीहाट सीट से छह बार के विधायक बिशन सिंह चुफाल और पिछली कैबिनेट में मंत्री रह चुके कालाढूंगी विधायक बंशीधर भगत कैबिनेट में वरिष्ठ नेताओं को नज़रअंदाज़ न किए जाने की बात कह चुके हैं.
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