हिमालय प्रहरी

शिक्षा के मंदिर बने बाल मजदूरी के अड्डे! सिलेंडर के बाद अब बर्तन और किताबें ढोते मिले मासूम”

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राजू अनेजा, रुद्रपुर।सरकारी स्कूलों को “शिक्षा का मंदिर” कहा जाता है, लेकिन रुद्रपुर से सामने आई तस्वीरें इस पर बड़ा सवाल खड़ा कर रही हैं। यहां पढ़ाई करने आए मासूम बच्चों से मजदूरी कराई जा रही है—कहीं वे किताबों के बंडल ढो रहे हैं, तो कहीं बर्तन उठाते नजर आ रहे हैं।
शैक्षणिक सत्र के पहले ही दिन जो नजारा देखने को मिला, उसने शिक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी। खंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय परिसर स्थित प्राथमिक विद्यालय में जहां बच्चों के चेहरे पर उत्साह होना चाहिए था, वहां वे जिम्मेदारियों का बोझ ढोते नजर आए।
गर्मी के बीच एक तरफ शिक्षक कमरे में बैठकर पंखे की हवा लेते रहे, वहीं दूसरी तरफ छोटे-छोटे बच्चे मजदूरों की तरह काम करते दिखे। संजयनगर खेड़ा के प्राथमिक विद्यालय में जब टीम पहुंची तो बच्चों को किताबों के बंडल उठाकर इधर-उधर ले जाते देखा गया। जैसे ही फोटो लेने की कोशिश हुई, एक शिक्षक ने तुरंत बच्चों से किताबें रखवाईं और उन्हें कक्षाओं में भेज दिया—मानो सच को छिपाने की कोशिश की जा रही हो।

सिलेंडर कांड के बाद भी नहीं सुधरी व्यवस्था

यह कोई पहला मामला नहीं है। हाल ही में रम्पुरा के राजकीय प्राथमिक विद्यालय में परीक्षा देने आए कक्षा पांच के एक छात्र को गैस सिलेंडर लाने के लिए भेज दिया गया था। स्कूली ड्रेस में लाइन में खड़े उस बच्चे की तस्वीर सामने आने के बाद मामला तूल पकड़ गया था।
घटना के बाद प्रभारी मुख्य शिक्षा अधिकारी हरेंद्र मिश्रा ने संबंधित स्कूल को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया था और कार्रवाई की बात कही थी। लेकिन हैरानी की बात है कि बुधवार तक न तो कोई ठोस कार्रवाई हुई और न ही जिम्मेदारों पर कोई असर दिखा।
कानून के बावजूद बच्चों से काम क्यों?
बच्चों से श्रम कराना कानूनन अपराध है। इसके बावजूद स्कूलों में इस तरह की घटनाएं होना कई सवाल खड़े करता है—
क्या शिक्षकों ने अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लिया है?

क्या अधिकारियों के आदेश सिर्फ कागजों तक सीमित हैं?और सबसे बड़ा सवाल—क्या बच्चों का बचपन अब सिस्टम के भरोसे सुरक्षित है?
सिस्टम पर उठते सवाल, जवाब का इंतजार
लगातार सामने आ रही इन घटनाओं ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। “मुस्कराइए! आप सरकारी स्कूल में हैं” जैसे नारे अब मजाक बनते जा रहे हैं।
अगर समय रहते जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह साफ संदेश जाएगा कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई से ज्यादा “काम” करवाना ही व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है।
अब देखना यह है कि प्रशासन इस गंभीर मामले को कितनी गंभीरता से लेता है—
क्या सिर्फ नोटिस जारी होंगे, या फिर सच में बदलाव की शुरुआत होगी?

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