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पांच फतह के बाद गदरपुर से जीत का छक्का जड़कर, क्या अरविंद पांडे प्रदेश में रचेंगे नया इतिहास?

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पांच चुनाव जीतकर बना चुके मजबूत किला, अब 2027 में छठी जीत पर नजर—भाजपा के इस दिग्गज का गदरपुर में फिर दिखेगा दम?

 

धामी सरकार से तल्खियों का दौर पीछे छूटा, अब रिश्तों में आई गर्माहट; भाजपा की हैट्रिक के साथ पांडे की नजर जीत के ‘छक्के’ पर

राजू अनेजा,गदरपुर। उत्तराखंड की सियासत में कुछ चेहरे ऐसे हैं, जिन्होंने चुनावी मैदान में लगातार जीत दर्ज कर अपनी अलग पहचान बनाई है। इन्हीं में एक नाम है अरविंद पांडे का। बाजपुर से राजनीतिक सफर शुरू करने वाले पांडे ने गदरपुर को भी अपनी सियासी जमीन बना लिया और लगातार तीन विधानसभा चुनाव जीतकर यहां अपना मजबूत जनाधार खड़ा किया। अब नजर 2027 के विधानसभा चुनाव पर है। बड़ा सवाल यही है कि क्या अरविंद पांडे गदरपुर से लगातार चौथी और अपने राजनीतिक सफर की छठी विधानसभा जीत दर्ज कर जीत का छक्का जड़ पाएंगे?
बाजपुर से शुरू हुआ सफर, गदरपुर में जमाया सियासी किला
अरविंद पांडे का राजनीतिक सफर उत्तराखंड राज्य गठन के बाद तेजी से आगे बढ़ा। भाजपा नेतृत्व ने उन्हें पहली बार बाजपुर विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में उतारा। वर्ष 2002 में उन्होंने पार्टी के भरोसे को जीत में बदला। इसके बाद 2007 में भी उन्हें टिकट मिला और उन्होंने लगातार दूसरी बार विधानसभा चुनाव जीतकर अपनी मजबूत पकड़ साबित की।
वर्ष 2012 में परिसीमन के बाद बाजपुर विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गई। इसके बाद भाजपा ने अरविंद पांडे को पड़ोसी गदरपुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतारा। सीट बदली, लेकिन पांडे का चुनावी असर कायम रहा। उन्होंने गदरपुर से भी जीत दर्ज कर यह साबित किया कि उनका जनाधार सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं है।

 

2012, 2017 और 2022—गदरपुर ने हर बार दिया साथ

 

गदरपुर से अरविंद पांडे ने वर्ष 2012 में पहली बार जीत दर्ज की। इसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने फिर भारी मतों से जीत हासिल की। लगातार दो जीत के बाद भाजपा सरकार में उन्हें मंत्री पद की जिम्मेदारी मिली और प्रदेश की राजनीति में उनका कद और बढ़ गया।
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने उन पर भरोसा जताया और पांडे ने लगातार तीसरी बार गदरपुर से जीत दर्ज कर विधानसभा में अपनी मौजूदगी कायम रखी। इस तरह अब तक वह पांच विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं—दो बाजपुर और तीन गदरपुर से।
यही वजह है कि 2027 का चुनाव उनके लिए सामान्य चुनाव नहीं बल्कि एक बड़ा राजनीतिक पड़ाव माना जा रहा है। जीत मिलती है तो उनके खाते में छठी विधानसभा जीत दर्ज होगी।

 

धामी सरकार से तल्खियां थीं चर्चा में, अब रिश्तों में आई सामान्यता

 

एक दौर में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार के साथ अरविंद पांडे की तल्खियों की राजनीतिक गलियारों में खूब चर्चा रही। लेकिन समय के साथ दोनों के बीच राजनीतिक समीकरणों में सामान्यता दिखाई देने लगी है। भाजपा संगठन और सरकार के साथ बेहतर तालमेल उनके लिए आगामी चुनाव में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
राजनीति में समीकरण तेजी से बदलते हैं और पांडे भी इस बात को बखूबी समझते हैं। यही कारण है कि अब उनका फोकस संगठन, कार्यकर्ताओं और अपने पुराने जनाधार को और मजबूत करने पर माना जा रहा है।
धामी मंत्रिमंडल में मिला था बड़ा जिम्मा
2017 में लगातार चौथी बार विधायक बनने के बाद अरविंद पांडे को धामी से पहले की भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री की जिम्मेदारी मिली थी। उन्होंने बेसिक शिक्षा, खेलकूद, पंचायती राज, युवा कल्याण, संस्कृत शिक्षा और प्रौढ़ शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभागों का दायित्व संभाला।
मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल ने उन्हें प्रदेश स्तर पर भी पहचान दिलाई। गदरपुर की राजनीति से निकलकर वह भाजपा सरकार के प्रमुख चेहरों में शामिल हुए।

 

गदरपुर में ऐसा जनाधार कि अल्पसंख्यक वोट भी बनते रहे सहारा

अरविंद पांडे की चुनावी ताकत का एक महत्वपूर्ण पहलू उनका व्यापक सामाजिक जनाधार माना जाता है। गदरपुर विधानसभा क्षेत्र सामाजिक और राजनीतिक रूप से विविधता वाला क्षेत्र है। इसके बावजूद पांडे लगातार चुनाव जीतने में सफल रहे।
उनके समर्थकों का दावा है कि गदरपुर में उनका संपर्क केवल भाजपा के परंपरागत वोट बैंक तक सीमित नहीं है। अल्पसंख्यक समाज के बीच भी उन्हें समर्थन मिलता रहा है, जो उनके चुनावी समीकरण को दूसरी पार्टियों के लिए चुनौतीपूर्ण बनाता है।
हालांकि 2027 में तस्वीर कैसी होगी, यह चुनावी मैदान में उतरने वाले प्रत्याशियों, स्थानीय मुद्दों और जनता के मूड पर निर्भर करेगा।

 

चीनी मिल के दरबान के बेटे से प्रदेश के मंत्री तक का सफर

 

अरविंद पांडे की राजनीतिक कहानी का एक पहलू उनका पारिवारिक संघर्ष भी है। उनके पिता स्वर्गीय वीरेंद्र पांडे बाजपुर चीनी मिल में दरबान के पद पर कार्यरत थे। परिवार बाजपुर में ही रहता था और वहीं अरविंद पांडे समेत उनके भाइयों की शिक्षा हुई।
साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से निकलकर राजनीति में अपनी जगह बनाना उनके सफर की खासियत रही है। आज वह उत्तराखंड भाजपा के उन नेताओं में गिने जाते हैं, जिनके खाते में लगातार पांच विधानसभा चुनाव जीतने का रिकॉर्ड है।

1997 में पालिका चुनाव से शुरू की थी राजनीतिक पारी

विधानसभा की राजनीति में आने से पहले ही अरविंद पांडे ने स्थानीय राजनीति में अपनी पकड़ बना ली थी। वर्ष 1997 में उन्होंने बाजपुर नगर पालिका का चुनाव लड़ा और चेयरमैन चुने गए। इसके बाद भाजपा ने उन्हें विधानसभा चुनाव में मौका दिया और यहीं से उनका राजनीतिक सफर लगातार आगे बढ़ता गया।नगर पालिका से शुरू हुई राजनीतिक पारी विधानसभा और फिर कैबिनेट तक पहुंची।

अब सबसे बड़ा सवाल—छठी जीत या बदलेगा गदरपुर का सियासी गणित?

 

2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन गदरपुर की सियासत में इसके समीकरण बनने लगे हैं। अरविंद पांडे के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पुराने जनाधार को कायम रखने की होगी। दूसरी ओर विपक्ष उनके लंबे राजनीतिक कार्यकाल को मुद्दा बनाकर सत्ता विरोधी माहौल बनाने की कोशिश करेगा।
पांडे के पक्ष में सबसे बड़ी ताकत उनका पांच बार का चुनावी अनुभव, संगठन में पकड़ और गदरपुर में लगातार तीन जीत का रिकॉर्ड है। विपक्ष के लिए चुनौती यह होगी कि इस मजबूत किले में सेंध कैसे लगाई जाए।
भाजपा यदि प्रदेश में लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल करने की रणनीति बनाती है और गदरपुर में फिर अरविंद पांडे पर भरोसा जताती है, तो मुकाबला दिलचस्प होगा।
अब देखना यही है कि बाजपुर से शुरू हुआ अरविंद पांडे का विजय रथ गदरपुर में 2027 में भी दौड़ता है या सियासी समीकरण इस बार कोई नया मोड़ लेते हैं। अगर पांडे जीतते हैं तो उनके नाम के साथ दर्ज हो जाएगा—पांच जीत के बाद ‘जीत का छक्का’।

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