हिमालय प्रहरी

चुनावी बेला आते ही बिंदुखत्ता में दौड़ा करंट, लेकिन जमीं का हक अभी भी अधर में

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15 साल से ठप योजना को मिली रफ्तार,राजस्व गांव का मुद्दा फिर पीछे
राजू अनेजा, लालकुआं।बिंदुखत्ता में चुनावी बेला आते ही विकास की तस्वीर अचानक बदलती नजर आ रही है। जो विद्युतीकरण योजना बीते 15 सालों से फाइलों में बंद पड़ी थी, वह अब ‘चुनावी करंट’ के साथ जमीन पर दौड़ती दिख रही है।
लेकिन इस तेजी के बीच सबसे बड़ा सवाल वही पुराना है—जमीन का हक आखिर कब मिलेगा?
चार साल पहले राजस्व गांव बनाने के दावे किए गए थे। मंचों से भरोसा दिलाया गया कि बिंदुखत्ता को उसका अधिकार दिलाया जाएगा, लेकिन आज तक यह वादा अधूरा ही है। फाइलें आगे नहीं बढ़ीं, और लोग आज भी अपने हक के इंतजार में बैठे हैं।
जैसे ही चुनाव की आहट हुई, करीब 15 करोड़ की बिजली योजना को हरी झंडी दे दी गई। इससे क्षेत्र में हलचल जरूर बढ़ी है, लेकिन लोगों के मन में सवाल भी उतनी ही तेजी से उठ रहे हैं कि आखिर यह योजना अब ही क्यों शुरू हुई?
गांव में गूंज रहा तंज
ग्रामीणों के बीच अब यह बात आम हो गई है—
“चुनाव आया, करंट लाया… लेकिन हक अब भी नहीं आया।”
एक स्थानीय निवासी ने नाराजगी जताते हुए कहा—“अगर यही काम पहले हो जाता, तो आज हमें अपने हक के लिए भटकना नहीं पड़ता। अब चुनाव है, तो बिजली भी दौड़ रही है।”
विकास या चुनावी रणनीति?
स्थानीय लोग इसे विकास से ज्यादा चुनावी गणित मान रहे हैं। उनका कहना है कि बिजली की योजना जरूरी थी, लेकिन राजस्व गांव का मुद्दा बार-बार टालना सरकार की मंशा पर सवाल खड़ा करता है।
जमीनी हकीकत कुछ और
मंच से विकास के दावे भले ही बड़े-बड़े हों, लेकिन जमीन पर हकीकत अलग ही तस्वीर दिखा रही है। बिजली की लाइनें बिछने की तैयारी है, लेकिन जमीन का अधिकार अब भी अधर में लटका हुआ है।
जनता का सीधा सवाल
बिंदुखत्ता में अब हर चौपाल पर एक ही सवाल गूंज रहा है—
“क्या हर चुनाव में ऐसे ही ‘करंट’ दौड़ेगा और हक हर बार अधूरा ही रहेगा?”
अब देखना यह होगा कि इस बार जनता इस ‘चुनावी करंट’ को कितना स्वीकार करती है, या फिर अपने वोट से इसका जवाब देती है।
अगर चाहो तो मैं इसे और ज्यादा आक्रामक (सीधे नाम लेकर या “जिम्मेदार कौन?” एंगल) में भी बदल सकता हूं 🔥

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