रुद्रपुर (उधम सिंह नगर): जनपद के चर्चित ‘पप्पू हत्याकांड’ में एक दशक से अधिक समय बाद अदालत का महत्वपूर्ण निर्णय सामने आया है। तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश मुकेश चंद्र आर्य की अदालत ने मृतक की पत्नी और उसके कथित प्रेमी को हत्या के आरोपों से बरी कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ अपराध सिद्ध करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य जुटाने में विफल रहा।
📅 क्या था मामला? (2015 की घटना)
यह मामला वर्ष 2015 का है, जब बाजपुर क्षेत्र में एक मजदूर की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी:
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हत्या का आरोप: मृतक के भाई मनोज कुमार (निवासी रामपुर, यूपी) ने आरोप लगाया था कि उसके भाई पप्पू की पत्नी के मलखान सिंह के साथ अवैध संबंध थे।
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वारदात: 22 अप्रैल 2015 की रात पप्पू का शव बाजपुर के एक खेत में मिला था। पुलिस का दावा था कि पत्नी ने प्रेमी के साथ मिलकर नशे की हालत में पप्पू की बिजली के तार से गला घोंटकर हत्या की थी।
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पुलिस की थ्योरी: पुलिस जांच के दौरान कथित तौर पर पत्नी ने जुर्म कबूल किया था, जिसके आधार पर चार्जशीट दाखिल की गई थी।
🏛️ अदालत का फैसला: ‘संदेह का लाभ’
लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने बचाव पक्ष के वकीलों विक्रमजीत सिंह और आरडी मजूमदार के तर्कों को स्वीकार किया:
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साक्ष्यों की कमी: अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष (Prosecution) ऐसा कोई ठोस या विश्वसनीय प्रमाण पेश नहीं कर सका जिससे हत्या में दोनों की सीधी संलिप्तता साबित हो।
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परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Circumstantial Evidence): कोर्ट ने कहा कि केवल संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी अधूरी होने के कारण आरोपियों को ‘बेनिफिट ऑफ डाउट’ (संदेह का लाभ) दिया गया।
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दोषमुक्त: पप्पू की पत्नी और मलखान सिंह को सभी आरोपों से बाइज्जत बरी कर दिया गया।
🔍 फैसले का प्रभाव
यह हत्याकांड बाजपुर क्षेत्र में वर्षों तक सुर्खियों में रहा था। 11 साल तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद अब इस मामले का पटाक्षेप हो गया है। इस फैसले ने एक बार फिर साबित किया है कि कानून में ‘साक्ष्य’ ही सर्वोपरि हैं और पुलिस की थ्योरी को कोर्ट में साबित करना अनिवार्य है।
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