हिमालय प्रहरी

किच्छा में चला बेहड़ का मैजिक, राजेश प्रताप ने संदीप अरोड़ा को दी करारी शिकस्त

खबर शेयर करें -

निकाय चुनाव में कांग्रेस का परचम, शुक्ला की रणनीति पर भारी पड़ा बेहड़ का सियासी दांव—2027 से पहले किच्छा ने दिया बड़ा राजनीतिक संदेश

 

राजू अनेजा, किच्छा।किच्छा नगर पालिका चुनाव का परिणाम सामने आते ही क्षेत्र की सियासत में एक बार फिर विधायक तिलकराज बेहड़ का प्रभाव चर्चा के केंद्र में आ गया है। कांग्रेस प्रत्याशी राजेश प्रताप सिंह ने भाजपा प्रत्याशी संदीप अरोड़ा उर्फ सोनू को भारी अंतर से पराजित कर नगर पालिका अध्यक्ष पद पर कब्जा कर लिया। चुनाव भले ही नगर पालिका अध्यक्ष पद का था, लेकिन इसकी राजनीतिक गूंज सीधे 2027 के विधानसभा चुनाव तक पहुंचती दिखाई दे रही है।

 

यह मुकाबला राजेश प्रताप बनाम संदीप अरोड़ा से ज्यादा बेहड़ बनाम शुक्ला बन गया था।

चुनाव के दौरान भाजपा प्रत्याशी संदीप अरोड़ा के समर्थन में पूर्व विधायक एवं भाजपा प्रदेश प्रवक्ता राजेश शुक्ला ने पूरी ताकत झोंकी थी। दूसरी ओर कांग्रेस प्रत्याशी राजेश प्रताप सिंह के लिए विधायक तिलकराज बेहड़ लगातार मैदान में सक्रिय रहे। यही वजह रही कि चुनाव शुरू होते ही किच्छा की सियासत में इस मुकाबले को दोनों दिग्गजों के प्रभाव और राजनीतिक पकड़ की परीक्षा के तौर पर देखा जाने लगा था।

 

22 सितंबर का बवाल बना चुनाव का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट

 

 

22 सितंबर को मतदान के बाद स्ट्रांग रूम के बाहर जिस तरह विधायक तिलकराज बेहड़ और पूर्व विधायक राजेश शुक्ला के समर्थक आमने-सामने आए, उसने चुनाव को और हाईप्रोफाइल बना दिया। विवाद के दौरान बेहड़ को थप्पड़ मारे जाने का आरोप लगा और इसके बाद धक्का-मुक्की तथा हंगामा हुआ। पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा और दोनों नेताओं को हिरासत में लिए जाने की खबरें भी सामने आईं।

 

इस घटनाक्रम के बाद किच्छा का चुनाव महज स्थानीय निकाय चुनाव नहीं रह गया। हर नजर इस बात पर टिक गई कि मतपेटी से निकलने वाला जनादेश किस राजनीतिक खेमे के प्रभाव को मजबूत करेगा।

 

 

मतपेटियां स्ट्रांग रूम में बंद हुईं तो सियासत अदालत तक पहुंच गई

 

मतदान के बाद विवाद थमा नहीं। मतपेटियों की सुरक्षा और चुनावी प्रक्रिया को लेकर कांग्रेस की ओर से सवाल उठाए गए, जबकि भाजपा की ओर से इन आरोपों को खारिज किया गया। मतगणना को लेकर मामला पहले हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। अंततः सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सात अक्टूबर को मतगणना का रास्ता साफ हुआ।

 

यानी किच्छा का यह चुनाव मतदान केंद्र से लेकर स्ट्रांग रूम और फिर अदालत की चौखट तक पहुंचा, लेकिन अंतिम फैसला आखिरकार मतपेटियों से ही निकला।

 

 

शुक्ला के गढ़ में बेहड़ की सियासी पकड़ की परीक्षा

 

किच्छा में विधायक तिलकराज बेहड़ का लंबे समय से राजनीतिक प्रभाव माना जाता है, जबकि भाजपा के पूर्व विधायक राजेश शुक्ला भी क्षेत्र की राजनीति में मजबूत दखल रखते हैं। ऐसे में संदीप अरोड़ा के पीछे शुक्ला की सक्रियता और राजेश प्रताप सिंह के साथ बेहड़ की मौजूदगी ने चुनाव को सीधा राजनीतिक मुकाबला बना दिया था।

 

अब परिणाम ने कांग्रेस खेमे को उत्साहित कर दिया है और भाजपा के लिए किच्छा की राजनीतिक रणनीति पर नए सिरे से विचार करने का सवाल खड़ा किया है।

 

 

2027 से पहले किच्छा का परिणाम क्यों अहम?

 

किच्छा विधानसभा चुनाव से पहले यह नगर पालिका चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा था क्योंकि यहां से निकलने वाला राजनीतिक संदेश 2027 की तैयारियों को प्रभावित कर सकता है। चुनाव के दौरान दोनों पक्षों ने इसे प्रतिष्ठा से जोड़कर प्रचार किया और प्रदेश स्तर पर भी किच्छा की गतिविधियों पर नजर रही। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सहित भाजपा नेतृत्व के लिए भी यह सीट राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रही।

 

अब राजेश प्रताप सिंह की जीत के बाद कांग्रेस इसे अपने पक्ष में बने जनसमर्थन के संकेत के रूप में पेश कर सकती है, जबकि भाजपा के सामने इस परिणाम के कारणों और आगामी विधानसभा रणनीति को लेकर आत्ममंथन की चुनौती होगी।

 

किच्छा ने फिलहाल अपना फैसला सुना दिया है—नगर की कुर्सी कांग्रेस के खाते में गई है। लेकिन असली राजनीतिक सवाल अब यह है कि क्या यह जनादेश 2027 के विधानसभा चुनाव में भी अपनी छाप छोड़ेगा? इसका जवाब आने वाले महीनों की राजनीति देगी।

Exit mobile version