
इस संभावित सियासी जमावड़े को साधारण मुलाकात मानने से राजनीतिक गलियारे इनकार कर रहे हैं। हालात यह हैं कि पार्टी के भीतर और बाहर हर चर्चा का केंद्र अब यही सवाल है—
आखिर यह सियासी ताकत का प्रदर्शन किस संदेश के साथ हो रहा है?
त्रिवेंद्र रावत की एंट्री क्यों बनी सत्ता के लिए सिरदर्द?
आपको बताते चले कि पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत बीते कुछ समय से सरकार पर लगातार तीखे जुबानी हमले कर रहे हैं। संसद में उनके बयान यह संकेत दे चुके हैं कि वह पार्टी और सरकार की कार्यशैली से असहज हैं। अब उनका तराई में सक्रिय होना, और वह भी ऐसे वक्त में जब अरविंद पांडे चर्चा के केंद्र में हैं, सीधे सत्ता को चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, त्रिवेंद्र सिंह रावत का अरविंद पांडे के आवास पर पहुंचना लगभग तय माना जा रहा है, हालांकि आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। यही वजह है कि यह दौरा राजनीतिक तापमान अचानक बढ़ा देने वाला बन गया है।
अनिल बलूनी की मौजूदगी—दिल्ली से सीधा सियासी संदेश?
सांसद अनिल बलूनी का इस घटनाक्रम से जुड़ना इसे स्थानीय राजनीति से उठाकर राष्ट्रीय फलक पर ले जाता है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो यह संकेत है कि मामला अब सिर्फ तराई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दिल्ली तक इसकी गूंज सुनाई देने वाली है।
अरविंद पांडे के लिए शक्ति प्रदर्शन या सत्ता को चेतावनी?
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा सबसे तेज है कि यह सियासी जमावड़ा
अरविंद पांडे के समर्थन का खुला संदेश हो सकता है
या फिर पार्टी के भीतर शक्ति-संतुलन को दोबारा परखने की कोशिश
भाजपा के अंदरूनी खेमों में फिलहाल चुप्पी है, लेकिन यही चुप्पी आने वाले बड़े सियासी घटनाक्रम का संकेत मानी जा रही है।
अब निगाहें गुरुवार पर टिकी हैं—
क्या गदरपुर से उठने वाली यह सियासी आहट, देहरादून की सत्ता तक पहुंचेगी?
एक बात तय है—
अरविंद पांडे के आवास पर होने वाला यह जमावड़ा, उत्तराखंड की राजनीति में नया अध्याय लिख सकता है।