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आखिरकार बगैर किसी तांडव के त्रिशूल चौक पर आसीन हुए ‘शिव’, जिले से लेकर प्रदेश तक सुर्खियों में आने के बाद याद आया प्रोटोकॉल

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राजू अनेजा,रुद्रपुर। महाशिवरात्रि के अवसर पर 15 फरवरी को हुए भव्य आयोजन के बाद उपजे विवाद का पटाक्षेप आखिरकार शांतिपूर्ण ढंग से हो गया। त्रिशूल चौक पर स्थापित विशाल त्रिशूल के अनावरण के समय शिलापट्ट से स्थानीय विधायक शिव अरोड़ा का नाम गायब होने पर सियासी हलकों में जो हलचल मची थी, वह अब बिना किसी तांडव के थमती नजर आ रही है। प्रशासन ने पूर्व में लगे शिलापट्ट पर रंग पोतकर नए शिलापट्ट की स्थापना की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

ज्ञात हो कि महाशिवरात्रि पर आयोजित कार्यक्रम में प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने त्रिशूल का अनावरण किया था। आयोजन भव्य रहा, लेकिन शिलापट्ट पर विधायक का नाम न होना चर्चा का विषय बन गया। विपक्ष ने इसे प्रोटोकॉल की अनदेखी बताया, जबकि प्रशासनिक सूत्रों ने इसे तकनीकी त्रुटि कहा।

 

विवाद से समाधान तक

मामला तूल पकड़ता उससे पहले ही प्रशासन ने स्थिति को संभालने की कोशिश की। पुराने शिलापट्ट को रंग से ढक दिया गया है और बताया जा रहा है कि संशोधित शिलापट्ट शीघ्र स्थापित किया जाएगा। इस कदम के बाद सियासी बयानबाजी भी कुछ हद तक थम गई है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों को राजनीतिक विवाद का रूप नहीं दिया जाना चाहिए। वहीं जनप्रतिनिधियों के सम्मान को लेकर संवेदनशीलता भी स्वाभाविक मानी जा रही है।

 

अब पलटी तस्वीर: रंग से ढका गया शिलापट्ट

विवाद गहराया तो आखिरकार वही शिलापट्ट रंग से पुतवा दिया गया। सूत्रों के मुताबिक अब नया शिलापट्ट स्थापित किया जाएगा।
सवाल उठता है—अगर सब कुछ “तकनीकी भूल” था तो सुधार में इतनी देरी क्यों? और अगर भूल नहीं थी, तो किसके इशारे पर नाम गायब हुआ?
राजनीतिक हलकों में इसे “सत्य और मर्यादा की जीत” बताया जा रहा है। समर्थकों का कहना है—सम्मान में कोई संधि नहीं होती। वहीं विरोधी पूछ रहे हैं—क्या यह सुधार दबाव का परिणाम है?

प्रोटोकॉल पर उठे सवाल

राजनीतिक जानकारों के अनुसार, मुख्यमंत्री स्तर के कार्यक्रमों में स्थानीय विधायक का नाम शिलापट्ट पर अंकित होना सामान्य परंपरा है। ऐसे में नाम का छूटना कई सवाल खड़े कर गया था। हालांकि अब सुधारात्मक कदम उठाए जाने के बाद स्थिति सामान्य होती दिख रही है।

चुनावी चौखट पर बढ़ी संवेदनशीलता

उधम सिंह नगर की राजनीति पहले ही गरम है। विकास कार्यों की होड़, संगठनात्मक समीकरण और चुनावी तैयारी—सब कुछ एक साथ चल रहा है। ऐसे में किसी भी सार्वजनिक मंच पर शक्ति संतुलन का इशारा बड़ा मायने रखता है।
राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि मंच पर मौजूदगी और शिलापट्ट पर नाम—दोनों ही “दृश्य राजनीति” के अहम औजार हैं। जहां नाम है, वहां पहचान है; जहां पहचान है, वहीं राजनीतिक वजन।

जांच की मांग

स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों की मांग है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच हो।
क्योंकि मामला केवल एक नाम का नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधि के सम्मान और प्रशासनिक पारदर्शिता का है।

संगठन और प्रशासन में संतुलन

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह संकेत दिया है कि सार्वजनिक कार्यक्रमों में समन्वय और प्रोटोकॉल का पालन कितना महत्वपूर्ण है। सूत्रों के मुताबिक, भविष्य में ऐसे मामलों में अतिरिक्त सतर्कता बरती जाएगी ताकि किसी प्रकार की असहज स्थिति उत्पन्न न हो।

फिलहाल शांति

त्रिशूल चौक पर अब त्रिशूल स्थापित है, नया शिलापट्ट लगाए जाने की तैयारी है और राजनीतिक माहौल भी अपेक्षाकृत शांत है।
कहा जा सकता है कि जो विवाद कुछ दिनों तक सुर्खियों में रहा, उसका समाधान बिना किसी तांडव के हो गया—और ‘शिव’ आखिरकार त्रिशूल चौक पर औपचारिक रूप से आसीन हो गए।

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