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उत्तराखंड में होली का आगाज: चमोली से खटीमा तक गूंजे पारंपरिक राग; महिलाओं ने संभाली ‘होली महोत्सव’ की कमान

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देवभूमि: जैसे-जैसे होली का त्योहार नजदीक आ रहा है, उत्तराखंड के पहाड़ों और तराई क्षेत्रों में सांस्कृतिक विरासत का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। कहीं बैठकी होली के शास्त्रीय राग सुनाई दे रहे हैं, तो कहीं खड़ी होली की थाप पर लोग झूम रहे हैं।

1. काली कुमाऊं की ऐतिहासिक धरोहर (लोहाघाट)

चंपावत के लोहाघाट में काली कुमाऊं की होली का वैभव देखने को मिल रहा है। रामलीला मैदान में आयोजित दो दिवसीय ‘होली महोत्सव’ में बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक ने अपनी विरासत को जीवंत रखा है।

  • खासियत: पारंपरिक वेशभूषा में सजी महिला होल्यारों पर पुष्प वर्षा कर उनका स्वागत किया गया। यह आयोजन कुमाऊंनी संस्कृति को पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित करने का प्रमुख माध्यम बना है।

2. थराली (चमोली): वन विभाग के गेस्ट हाउस में सजी महफिल

थराली के बनरढौन में बधाणी सांस्कृतिक समिति के तत्वावधान में होली मिलन आयोजित हुआ।

  • प्रमुख गीत: “मत मारो मोहन पिचकारी” और “चली बसंत ब्यार” जैसे स्थानीय गीतों पर लोग जमकर थिरके।

  • प्रशासनिक अपील: एसडीएम पंकज भट्ट ने सभी से इस पावन पर्व को शांति और सद्भाव के साथ मनाने की अपील की।

3. खटीमा: कुमाऊंनी और थारू संस्कृति का संगम

तराई के खटीमा में होली का रंग सबसे अलग दिखा। यहाँ विधायक भुवन कापड़ी की धर्मपत्नी कविता कापड़ी द्वारा आयोजित ‘मातृ शक्ति होली मिलन’ में दो संस्कृतियों का मिलन हुआ।

  • विशेष प्रस्तुति: कुमाऊंनी होल्यारों के साथ-साथ थारू जनजाति के होलियारों ने अपनी पारंपरिक शैली में प्रस्तुति देकर समां बांध दिया।

4. रामनगर: भक्ति और संगीत की त्रिवेणी

रामनगर में महिलाएं घरों की जिम्मेदारी के बाद टोलियों में निकलकर खड़ी और बैठकी होली के जरिए परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं।

  • बैठकी होली: यह शास्त्रीय रागों पर आधारित होती है, जहाँ तबला और हारमोनियम की संगत में आध्यात्मिक गीत गाए जाते हैं।

  • खड़ी होली: इसमें महिलाएं गोल घेरा बनाकर सामूहिक गायन करती हैं।


कुमाऊंनी होली का इतिहास और महत्व

कुमाऊं की होली उत्तर भारत की सामान्य होली से काफी अलग और समृद्ध है:

  • ऐतिहासिक जड़ें: इसकी शुरुआत सैकड़ों वर्ष पूर्व चंद्रवंशी राजाओं के शासनकाल में हुई थी।

  • सांस्कृतिक प्रभाव: इसमें मुगलकालीन दरबारी संगीत, भक्ति आंदोलन और विशेष रूप से कृष्ण भक्ति की स्पष्ट छाप दिखाई देती है।

  • आध्यात्मिक संगम: यहाँ होली केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि संगीत और रागों के जरिए ईश्वर की भक्ति का एक माध्यम है।


एक नज़र में होली के रंग

क्षेत्र प्रमुख विशेषता प्रमुख कलाकार/आयोजक
लोहाघाट काली कुमाऊं की खड़ी होली स्थानीय बुजुर्ग एवं महिला होल्यार
थराली स्थानीय भाषा के लोकगीत प्रेम देवराड़ी, मोहन राम आर्या
खटीमा थारू एवं कुमाऊंनी संगम कविता कापड़ी एवं मातृ शक्ति
रामनगर शास्त्रीय राग एवं बैठकी होली महिला मंडल एवं संगीत प्रेमी

सांस्कृतिक संदेश: उत्तराखंड की यह होली ‘एकता और सद्भाव’ का प्रतीक है, जहाँ संगीत की तान पर भेदभाव मिट जाते हैं।

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