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देहरादून: सड़क हादसों के पीड़ितों को ‘गोल्डन ऑवर’ (दुर्घटना के बाद का पहला घंटा) के भीतर तत्काल और निःशुल्क उपचार मुहैया कराने के उद्देश्य से भारत सरकार द्वारा शुरू की गई महत्वाकांक्षी ‘पीएम राहत’ (PM RAHAT) योजना उत्तराखंड में सुस्त रफ्तार से चलती नजर आ रही है। देश के साथ-साथ उत्तराखंड में भी यह योजना 13 फरवरी 2026 को लागू की गई थी। हालांकि, लागू होने के बाद से राज्य में करीब 400 सड़क हादसे हो चुके हैं, जिनमें 450 लोग घायल हुए, लेकिन प्रशासनिक और जमीनी स्तर पर जानकारी के अभाव के कारण 13 फरवरी से 3 जून 2026 तक मात्र 29 घायलों को ही इस योजना का विधिक लाभ मिल पाया है।
अस्पतालों का ₹8.11 लाख का भुगतान बकाया; अभी तक नहीं मिला बजट
उत्तराखंड राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण के आंकड़ों के अनुसार, योजना के तहत जिन 29 पीड़ितों को नजदीकी चिकित्सालयों में आपातकालीन सेवाएं उपलब्ध कराई गई थीं, उनके इलाज का कुल बिल ₹8,11,189 तैयार हुआ है। हैरान करने वाला विधिक तथ्य यह है कि अस्पतालों द्वारा यह बिल राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण को भेजे जाने के बावजूद अब तक किसी भी संबंधित अस्पताल को इस धनराशि का भुगतान नहीं हो पाया है। प्राधिकरण द्वारा इन बिलों के विधिक भुगतान के लिए भारत सरकार से बजट की मांग की जा रही है।
क्या है ‘पीएम राहत’ (PM-RAHAT) योजना?
यह केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की ओर से संचालित एक राष्ट्रीय और वैधानिक पहल है, जिसका पूरा नाम ‘रोड एक्सीडेंट विक्टिम हॉस्पिटलाइजेशन एंड अस्योर्ड ट्रीटमेंट’ है। योजना के मुख्य विधिक प्रावधान निम्नलिखित हैं:
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कैशलेस इलाज की सीमा: सड़क हादसे का शिकार हुए प्रत्येक पीड़ित को दुर्घटना की तिथि से अधिकतम 7 दिनों तक, प्रति पीड़ित ₹1.5 लाख तक के मुफ्त कैशलेस इलाज का विधिक प्रावधान है।
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स्थिरीकरण उपचार (Stabilization Care): सड़क दुर्घटना के सभी पीड़ितों को निर्धारित अस्पतालों में गैर-जीवन-घातक मामलों में 24 घंटे तक तथा जीवन-घातक (गंभीर) मामलों में 48 घंटे तक अनिवार्य स्थिरीकरण उपचार प्रदान किया जाएगा।
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केंद्रीय प्राथमिक कानून: यह वैधानिक योजना देश में लागू किसी भी अन्य केंद्रीय या राज्य स्तरीय स्वास्थ्य योजनाओं पर प्राथमिकता रखेगी।
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फंडिंग की व्यवस्था: अस्पतालों को इस खर्च की प्रतिपूर्ति ‘मोटर वाहन दुर्घटना निधि’ (MVAF) के जरिए की जाती है। यदि दुर्घटना करने वाला वाहन बीमित (Insured) है, तो सामान्य बीमा कंपनियां इस फंड में योगदान देती हैं। वहीं, बिना बीमा वाले वाहनों और ‘हिट-एंड-रन’ के मामलों में सरकार बजटीय सहायता के जरिए इसका खर्च वहन करती है।
राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण का पक्ष: धन के अभाव में न हो किसी की मौत
उत्तराखंड राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण की मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) रीना जोशी ने योजना के विधिक ढांचे पर प्रकाश डालते हुए बताया कि आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत पंजीकृत सभी अस्पताल इस योजना में स्वतः शामिल हैं। इसके अलावा गैर-पंजीकृत अस्पतालों में भी घायलों के निशुल्क इलाज का प्रावधान है।
सीईओ रीना जोशी ने स्पष्ट किया कि, “यह योजना महज सामान्य लाभ उठाने जैसी नहीं है, बल्कि इसे इसलिए लागू किया गया है ताकि ‘गोल्डन पीरियड’ के दौरान धन के अभाव में किसी भी घायल की असमय मौत न हो। राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण की भूमिका अस्पतालों से प्राप्त विधिक बिलों को सत्यापित कर केंद्र सरकार से बजट की डिमांड करने की है। प्राधिकरण का पूरा प्रयास है कि इस अत्यंत महत्वपूर्ण योजना की जानकारी आम जनमानस तक पहुंचे ताकि सड़क हादसों में मौतों के बढ़ते आंकड़े पर लगाम लगाई जा सके।”
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