राजू अनेजा, रुद्रपुर। अक्सर सियासी घमासान का गलियारा रहने वाले रुद्रपुर में आज एक बार फिर सियासी माहौल अपने चरम पर दिखाई दिया।मुख्य चौराहे पर भव्य त्रिशूल स्थापित हुआ, रोशनी हुई, फीता कटा… लेकिन शिलापट्ट पर ‘शिव’ ही गायब मिले। सवाल उठना लाजिमी है—त्रिशूल बिना शिव के आखिर किस संदेश का प्रतीक है?
विधानसभा चुनाव की आहट के बीच शहर के मुख्य चौराहे पर स्थापित त्रिशूल अब केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश बन चुका है। मंच सजा, कैमरे चमके, तालियां बजीं—प्रदेश के मुखिया पुष्कर सिंह धामी ने विधिवत अनावरण किया। मगर जैसे ही शिलापट्ट पर नजर गई, सियासत की नसें तन गईं—विधायक शिव अरोड़ा का नाम गायब!
त्रिशूल तो स्थापित हो गया… पर ‘शिव’ नदारद।और रुद्रपुर में प्रतीकों की राजनीति यूं ही नहीं होती।
अबकी सियासी अखाड़ा: अपने ही आमने-सामने
अब तक शहर की राजनीति में पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल और शिव अरोड़ा के बीच जुबानी जंग सुर्खियां बटोरती रही। लेकिन इस बार कहानी में नया मोड़ है। मामला एक ही पार्टी के भीतर शक्ति प्रदर्शन का है।
मुख्य चौराहे के सौंदर्यकरण का श्रेय मेयर विकास शर्मा के खाते में जा रहा है। मगर सवाल यह है—क्या यह सौंदर्यकरण सियासी संतुलन बिगाड़ने की कीमत पर हुआ?
क्या शिलापट्ट से नाम गायब होना महज़ एक ‘टेक्निकल गलती’ है?
या फिर चुनाव से पहले वर्चस्व की बिसात पर चली गई एक चाल?
संकेत या संयोग?
रुद्रपुर की सियासत में संदेश अक्सर प्रतीकों के जरिए दिए जाते हैं। कुछ ही दिन पहले एक सरकारी कार्यक्रम में फोटो को लेकर नाराजगी सामने आई थी। अब शिलापट्ट से नाम ही गायब। क्या यह इत्तेफाकों की श्रृंखला है या सुनियोजित संकेत?
सूत्रों की मानें तो फुसफुसाहट तेज है—
कहीं यह शिलापट्ट से नाम गायब होना, टिकट की सूची से नाम गायब होने की पटकथा तो नहीं?
चुनाव से पहले ऐसे प्रतीकात्मक घटनाक्रम अक्सर बड़े फैसलों की आहट माने जाते हैं।
ऐसे लड़ोगे तो कैसे खिलेगा ‘फूल’
पार्टी का चुनाव चिन्ह “फूल” है। लेकिन जब अपने ही घर में खींचतान तेज हो, तो फूल का खिलना आसान नहीं होता। कार्यकर्ताओं में खामोशी है, पर अंदरखाने हलचल तेज बताई जा रही है।क्या आलाकमान डैमेज कंट्रोल करेगा?क्या शिलापट्ट बदलेगा?
या फिर यह विवाद चुनावी भाषणों का स्थायी मुद्दा बन जाएगा?
त्रिशूल खड़ा है… तांडव किसका?
रुद्रपुर का मुख्य चौराहा अब सिर्फ ट्रैफिक का केंद्र नहीं, बल्कि सियासी टकराव का प्रतीक बन चुका है। त्रिशूल अपनी जगह अडिग है, लेकिन राजनीति की जमीन हिल रही है।
चुनाव की दस्तक के बीच यह साफ है—
रुद्रपुर में लड़ाई केवल विकास की नहीं, बल्कि श्रेय, शक्ति और भविष्य की दावेदारी की है।
अब देखना यह है कि तांडव कौन करता है…
और उसका असर किसके राजनीतिक भविष्य पर पड़ता है।
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