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उत्तराखंड कांग्रेस का मास्टरस्ट्रोक: जिलाध्यक्षों को मिली ‘वीटो पावर’, अब उन्हीं की मुहर से तय होंगे विधायकों के टिकट

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हल्द्वानी/कुरुक्षेत्र: उत्तराखंड में विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस ने अपने सांगठनिक ढांचे को पूरी तरह से बदलने का मन बना लिया है। कुरुक्षेत्र में आयोजित ‘संगठन सृजन प्रशिक्षण शिविर’ में पार्टी ने तय किया है कि अब टिकट वितरण की चाबी स्थानीय जिलाध्यक्षों के हाथ में होगी।

🔑 ‘वीटो पावर’: जिलाध्यक्षों की सहमति अनिवार्य

कांग्रेस आलाकमान ने निर्णय लिया है कि उत्तराखंड की किसी भी विधानसभा सीट पर प्रत्याशी का चयन करते समय संबंधित जिलाध्यक्ष की भूमिका निर्णायक होगी:

  • अनिवार्य सहमति: टिकट फाइनल करने से पहले नेता प्रतिपक्ष, प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी के साथ-साथ जिलाध्यक्ष की सहमति जरूरी होगी।

  • अधिकार: यदि जिलाध्यक्ष किसी नाम पर असहमति जताता है, तो पार्टी उस टिकट पर पुनर्विचार करेगी। इसका उद्देश्य ‘पैराशूट उम्मीदवारों’ (बाहरी नेताओं) पर रोक लगाना है।


🏆 जिलाध्यक्षों में से ही चुना जाएगा ‘प्रदेश अध्यक्ष’

पार्टी ने कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाने के लिए एक और बड़ी घोषणा की है। भविष्य में उत्तराखंड कांग्रेस का जो भी प्रदेश अध्यक्ष बनेगा, वह इन्हीं 27 जिलाध्यक्षों में से होगा।

  • मापदंड: जिसका प्रदर्शन सबसे सक्रिय और प्रभावी होगा, उसे ही संगठन की सर्वोच्च कमान सौंपी जाएगी।

  • सन्देश: अब जिलाध्यक्ष केवल भीड़ जुटाने वाले मोहरे नहीं, बल्कि सत्ता की रणनीति के मुख्य केंद्र होंगे।


🛡️ राहुल गांधी का ‘संगठन सर्वोपरि’ मंत्र

शिविर में पहुंचे कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने उत्तराखंड के 26 जिलाध्यक्षों से सीधा संवाद किया और स्पष्ट संदेश दिया:

  1. जमीनी काम: अवसर केवल उन्हें मिलेगा जो जमीन पर संघर्ष कर रहे हैं।

  2. व्यक्तिवाद का अंत: संगठन व्यक्ति से बड़ा है; बड़े नेताओं के बजाय कैडर को प्राथमिकता दी जाएगी।

  3. उत्तरदायित्व: जो जिलाध्यक्ष निष्क्रिय पाए जाएंगे, उन्हें तत्काल पद से हटाया जाएगा।

🎤 क्या कहते हैं नेता?

  • गणेश गोदियाल (प्रदेश अध्यक्ष): “हम जिलाध्यक्षों के अधिकार बढ़ा रहे हैं ताकि बूथ स्तर तक एक मजबूत और स्वाभिमानी कैडर खड़ा हो सके।”

  • राहुल छिमवाल (जिलाध्यक्ष, नैनीताल): “केंद्रीय नेतृत्व ने हमें हमारी शक्तियों का एहसास कराया है। अब स्थानीय कार्यकर्ताओं की अनदेखी नहीं होगी।”

  • गोविंद सिंह बिष्ट (महानगर अध्यक्ष, हल्द्वानी): “जिलाध्यक्ष की असहमति का मतलब है कि उस टिकट पर दोबारा विचार होगा। यह जमीनी कार्यकर्ताओं की जीत है।”

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