
एक समय प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के बेहद करीबी माने जाने वाले त्रिवेंद्र इन दिनों दोनों से कुछ दूर दिखाई दे रहे हैं. यूं तो त्रिवेंद्र रावत सीएम पद त्यागकर इन नेताओं की रुसवाई को झेल चुके हैं, लेकिन शायद अब तक उनकी राजनीतिक भूलों को नही भुलाया जा सका है. तभी तो कुछ ऐसी तस्वीरें सामने आ जाती हैं, जो पुराने बेजोड़ संबंधों पर भी सवाल खड़े कर ही देती है. उत्तराखंड में अमित शाह का दौरा हो या फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की धार्मिक यात्रा. भारतीय जनता पार्टी इन कार्यक्रमों को उत्सव के रूप में मनाती है, लेकिन इस दौरान पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत को लेकर कुछ अधूरापन सा दिखाई देता है.
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त्रिवेंद्र सिंह रावत ने 4 साल तक सरकार चलाई और इस दौरान उन्होंने विधायकों और मंत्रियों को खुद से दूर रखा, उनका सरकार चलाने का स्टाइल तानाशाही के रूप में देखा जाने लगा. शायद यही कारण था कि मंत्री से लेकर विधायक तक अपनी शिकायत लेकर अमित शाह और मोदी तक जा पहुंचे. बार-बार त्रिवेंद्र सिंह रावत की शिकायतें और शिकायतों से जुड़े मुद्दे इस नाराजगी की वजह हो सकती है.
गैरसैण कमिश्नरी का एक तरफा निर्णय: त्रिवेंद्र सिंह रावत का कैबिनेट में गैरसैंण को कमिश्नरी बनाने का निर्णय लेना काफी विवादित रहा. इसके बाद तो कुमाऊं मंडल के अधिकतर विधायकों ने दिल्ली तक बिना राय के कमिश्नरी का निर्णय लिए जाने का मुद्दा पहुंचाया. माना जा रहा है कि इतनी बड़ी संख्या में विधायकों की नाराजगी से हाईकमान भी हिल गया था.
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देवस्थानम बोर्ड पर तीर्थ पुरोहितों की नाराजगी: त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ माहौल बनाने में देवस्थानम बोर्ड की भी अहम भूमिका रही, भारतीय जनता पार्टी हिंदुत्व मुद्दे के साथ आगे बढ़ती है और तीर्थ पुरोहित के साथ संत समाज भी इसी वजह से भाजपा को समर्थन करता हुआ दिखाई देता है, लेकिन तीर्थ पुरोहितों का सड़कों पर उतरना और भाजपा के इस एजेंडे पर ही सवाल खड़े होने से भी त्रिवेंद्र के खिलाफ पार्टी में कई लोगों के साथ ही आम लोगों में भी नाराजगी बढ़ी.
गैरसैण में लाठीचार्ज और भ्रष्टाचार मामले में सीबीआई जांच: गैरसैंण में सत्र के दौरान महिलाओं पर लाठीचार्ज होना और उसके बाद सरकार का इस मामले पर समय से कोई संतोषजनक बयान जारी ना होना भी त्रिवेंद्र के खिलाफ गया. यही नहीं नैनीताल हाईकोर्ट ने एक भ्रष्टाचार के मामले में उनके खिलाफ सीबीआई जांच की मंजूरी देकर उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि केंद्र तक को हिला दिया था. जाहिर है कि यह भी त्रिवेंद्र की परेशानी बढ़ाने के लिए उनके खिलाफ एक बड़ा कारण रहा.
कट सकता है त्रिवेंद्र का टिकट: भाजपा में जिस तरह त्रिवेंद्र सिंह रावत को लेकर समय-समय पर बातें उठती रही है, उससे भविष्य में उनके विधानसभा चुनाव लड़ने को लेकर भी सवाल खड़े होते रहे हैं. दरअसल जिस तरह उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाया गया, उसके बाद उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री बनाना मुश्किल दिखाई देता है. ऐसे में यदि उन्हें डोईवाला विधानसभा से टिकट दिया जाता है तो वह जीत कर आने पर एक सामान्य विधायक के रुप में ही रह जाएंगे. लिहाजा इस बार उनको टिकट दिया जाएगा, इस पर भी संशय बरकरार है.
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