हिमालय प्रहरी

4 साल पोकलैंड लेकर गोला में चैन की बंसी बजाते रहे मोहन, राजस्व गांव का मुद्दा कब तेज बहाव में डूब गया, पता ही न चला

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बरसात में गोला नदी का रुख मोड़ने की कवायद दिखी, लेकिन बिंदुखत्ता को राजस्व गांव बनाने का सबसे बड़ा वादा आज भी अधूरा

 

राजू अनेजा, लालकुआं।लालकुआँ विधानसभा की राजनीति में बरसात का मौसम आते ही एक तस्वीर अक्सर देखने को मिलती रही। गोला नदी में बढ़ते बहाव के बीच पोकलैंड मशीनें उतरती हैं, कटाव रोकने और नदी का रुख बदलने की कोशिशें होती हैं, और मौके पर विधायक मोहन सिंह बिष्ट भी सक्रिय नजर आते हैं। लेकिन इसी विधानसभा का सबसे बड़ा और वर्षों पुराना मुद्दा—बिंदुखत्ता को राजस्व गांव का दर्जा दिलाना—आज भी अधूरा है।

क्षेत्र के लोगों का कहना है कि चार साल से अधिक का कार्यकाल बीत गया, लेकिन हजारों परिवारों की उम्मीदों से जुड़ा यह मुद्दा फाइलों से बाहर नहीं निकल पाया। बरसात दर बरसात गोला नदी का बहाव मोड़ने की कवायद तो दिखाई दी, मगर राजस्व गांव का मुद्दा कब राजनीतिक बहाव में बह गया, इसका किसी को एहसास तक नहीं हुआ।

बिंदुखत्ता के लोग वर्षों से राजस्व गांव का दर्जा मिलने का इंतजार कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह केवल प्रशासनिक दर्जे का सवाल नहीं, बल्कि मूलभूत सुविधाओं, भूमि संबंधी अधिकारों और विकास की नई राह खोलने वाला निर्णय है। इसके बावजूद हर चुनाव में यह मुद्दा जोर-शोर से उठता है और चुनाव खत्म होते ही ठंडे बस्ते में चला जाता है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्हें अब वादों और आश्वासनों से आगे बढ़कर ठोस निर्णय चाहिए। उनका सवाल है कि यदि गोला नदी में हर साल राहत कार्य हो सकते हैं तो बिंदुखत्ता के राजस्व गांव के प्रस्ताव पर निर्णायक कदम क्यों नहीं उठ सके?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिंदुखत्ता का राजस्व गांव का मुद्दा आगामी विधानसभा चुनाव में सत्ता पक्ष के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। हजारों मतदाताओं से जुड़ा यह सवाल चुनावी समीकरणों पर सीधा असर डालने की क्षमता रखता है। क्षेत्र में एंटी इनकंबेंसी की चर्चा के बीच यह मुद्दा एक बार फिर जनता के बीच प्रमुखता से उठने लगा है।

उधर, विधायक मोहन सिंह बिष्ट समय-समय पर यह कहते रहे हैं कि राजस्व गांव का मामला सरकार के विचाराधीन है और इसे पूरा कराने के प्रयास जारी हैं। हालांकि, क्षेत्र के लोगों का कहना है कि अब उन्हें प्रयासों की नहीं, परिणामों की प्रतीक्षा है।

अब सवाल यह है कि क्या आगामी चुनाव से पहले बिंदुखत्ता को उसका वर्षों पुराना अधिकार मिलेगा, या फिर राजस्व गांव का मुद्दा एक बार फिर चुनावी वादों के बहाव में बह जाएगा?

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