हिमालय प्रहरी

बिंदुखत्ता ! चार साल से राजस्व गांव की बंसी बजा रहे थे मोहन,आखिर अंतिम समय मे क्यों बदल गयी धुन?

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राजू अनेजा, लालकुआं।हर बार की तरह इस बार भी राजस्व गांव का सपना दिखाकर बिंदुखत्ता वासियों के साथ छलावे की राजनीति होती नजर आ रही है। हैरानी यह कि हर चुनाव में विधायक चुनने में बिंदुखत्ता का वोटबैंक निर्णायक भूमिका निभाता है, लेकिन बदले में क्षेत्र को आज तक उसका सबसे बुनियादी हक नहीं मिल पाया।


धरने में गूंजा सवाल: आखिर कब मिलेगा राजस्व गांव का दर्जा?

बिंदुखत्ता वनाधिकार समिति के आह्वान पर लालकुआं तहसील प्रांगण में आयोजित एकदिवसीय धरना कार्यक्रम—जिसे प्रतीकात्मक रूप से “चाय पर चर्चा” नाम दिया गया—में सैकड़ों ग्रामीणों ने शिरकत की।
धरने का एक ही स्वर था—बिंदुखत्ता को तत्काल राजस्व गांव घोषित किया जाए।


सुबह से दोपहर तक गरमाया माहौल

प्रातः से दोपहर तक चले धरने में दो दर्जन से अधिक वक्ताओं ने सरकार और जनप्रतिनिधियों पर सवाल खड़े किए। वक्ताओं ने कहा कि फाइलें चलती रहीं,सर्वे होते रहे,लेकिन फैसला आज तक जमीन पर नहीं उतरा।धरने में कांग्रेस, भाजपा, पूर्व सैनिक संगठन, स्वयंसेवी संस्थाओं और वनाधिकार समिति से जुड़े लोग एक मंच पर नजर आए—जो इस मुद्दे की गंभीरता को खुद बयां करता है।


मातृशक्ति की हुंकार

कार्यक्रम में पहुंची मातृशक्ति ने भी सरकार से जल्द और सख्त फैसला लेने की मांग की। महिलाओं ने कहा कि राजस्व गांव का दर्जा न मिलने से बच्चों का भविष्य,परिवारों की सुरक्षा,और सरकारी योजनाओं का लाभ
सब अधर में लटका हुआ है।


चार साल से विधायक की आवाज़ भी बेअसर

लालकुआं विधानसभा से भाजपा विधायक मोहन सिंह बिष्ट बीते चार वर्षों से राजस्व गांव की मांग को उठा रहे हैं। विधानसभा से लेकर मंचों तक यह मुद्दा गूंजा, लेकिन सरकारी स्तर पर ठोस निर्णय न होना कई सवाल खड़े करता है
जनता पूछ रही है—“जब सत्ता पक्ष का विधायक भी बात नहीं मनवा पा रहा, तो दोष किसका?”


वोटबैंक मजबूत, हक कमजोर

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिंदुखत्ता का वोटबैंक चुनावी नतीजों को प्रभावित करता रहा है। बावजूद इसके, राजस्व गांव का मुद्दा हर चुनाव में सिर्फ घोषणापत्र और भाषणों तक सीमित रह जाता है।


सत्ता पक्ष के विधायक की भी नहीं सुनी जा रही बात?

यह सवाल अब राजनीतिक गलियारों में भी तैर रहा है। भाजपा के ही विधायक मोहन सिंह बिष्ट अगर चार साल में अपनी सबसे बड़ी मांग पूरी नहीं करा पाए, तो विपक्ष इसे सरकार की संवेदनहीनता बता रहा है। वहीं समर्थक इसे तंत्र की सुस्ती और अफसरशाही की ढिलाई से जोड़कर देख रहे हैं।

मोहन सिंह बिष्ट के सामने बड़ी अग्निपरीक्षा 

चार साल की कोशिशों के बाद अब विधायक मोहन सिंह बिष्ट के लिए यह मुद्दा राजनीतिक विश्वसनीयता की अग्निपरीक्षा बन गया है। अगर इस बार भी राजस्व गांव का सपना अधूरा रह गया, तो इसका जवाब सिर्फ सरकार को ही नहीं, जनता को भी देना होगा।

 

 

अब आंदोलन की चेतावनी 

धरने के दौरान वक्ताओं ने साफ कहा कि अगर सरकार ने जल्द फैसला नहीं लिया तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा
अब सवाल सीधा है—
क्या इस बार सरकार बिंदुखत्ता को उसका हक देगी,
या फिर चार साल से बज रही ‘राजस्व गांव’ की बंसी यूं ही बजती रहेगी और जनता सिर्फ इंतजार करती रहेगी?

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