हिमालय प्रहरी

अपनी ही सरकार में तख्तियां लेकर सड़क पर उतरे पूर्व भाजपा विधायक शुक्ला, बेहड़ का तीखा पलटवार — “हाईकोर्ट में मामला लंबित, यह सीधा न्यायालय का अनादर”

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राजू अनेजा,किच्छा/सिरौलीकला।सिरौलीकला नगर पालिका के मुद्दे पर शुरू हुआ आंदोलन अब खुली सियासी जंग में बदल गया है। एक तरफ भाजपा के पूर्व विधायक राजेश शुक्ला अपनी ही सरकार में तख्तियां लेकर सड़क पर उतरे, तो दूसरी ओर कांग्रेस के कद्दावर नेता तिलक राज बेहड़ ने इसे सीधा न्यायालय का अनादर करार दे दिया। मामला अब विकास बनाम न्यायिक प्रक्रिया से आगे बढ़कर राजनीतिक प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुका है।

शुक्ला का सड़क संग्राम: “जनता विकास चाहती है”

नई किसान मंडी से उपजिलाधिकारी कार्यालय तक निकाले गए जुलूस में समर्थकों की भीड़ और नारों की गूंज साफ संकेत दे रही थी कि यह सिर्फ प्रतीकात्मक प्रदर्शन नहीं था।
राजेश शुक्ला का कहना है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सिरौलीकला को नगर पालिका का दर्जा दिया गया, ताकि क्षेत्र का समग्र विकास हो सके। लेकिन चुनाव न होने से सड़क, नाली, स्ट्रीट लाइट, पार्क जैसी योजनाएं अधर में लटकी हुई हैं।
उनका दावा है कि यदि समय पर निकाय चुनाव हो जाते, तो करोड़ों की योजनाएं धरातल पर उतर चुकी होतीं। 18 फरवरी को प्रस्तावित हाईकोर्ट की सुनवाई को वे निर्णायक मान रहे हैं।
शुक्ला की अपील भावनात्मक अंदाज में सामने आई —
“जो हक़ का दीप जलाते हैं, वो आँधियों से नहीं डरते…”
इस शेर के साथ उन्होंने जनता से लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए आवाज उठाने की अपील की।

बड़ा सवाल: जब पहुंच सीएम तक, तो सड़क क्यों?

राजनीतिक हलकों में चर्चा का सबसे बड़ा केंद्र यही है।
जब शुक्ला की सीधी पकड़ मुख्यमंत्री तक बताई जाती है, तो फिर सार्वजनिक प्रदर्शन की क्या जरूरत थी?
क्या यह सरकार पर दबाव की रणनीति है?
या चुनावी साल से पहले अपनी जनस्वीकार्यता का प्रदर्शन?
सियासत में भीड़ सिर्फ भीड़ नहीं होती—वह संदेश होती है। और यह संदेश किसे दिया जा रहा है, यही बहस का मुद्दा है।

बेहड़ का पलटवार: “न्यायपालिका से ऊपर कोई नहीं”

इसी मुद्दे पर कांग्रेस नेता तिलक राज बेहड़ ने तीखा हमला बोला।उनका कहना है कि जब मामला हाईकोर्ट में लंबित है, तब सड़क पर प्रदर्शन करना न्यायालय की प्रक्रिया का अनादर है।

बेहड़ ने सवाल उठाया-

“अगर मामला अदालत में विचाराधीन है, तो क्या इस तरह का प्रदर्शन न्यायिक प्रक्रिया पर दबाव बनाने की कोशिश नहीं है?”
उन्होंने इस “राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन” को सरकार के खिलाफ फ्लॉप प्रदर्शन करार देते हुए कहा कि अदालत के फैसले से पहले इस तरह का आक्रामक रुख उचित नहीं।

सियासत गरम, प्रशासन सतर्क

प्रदर्शन के बाद क्षेत्र का राजनीतिक तापमान बढ़ गया है। प्रशासन भी अलर्ट मोड में है। 18 फरवरी की सुनवाई को लेकर दोनों खेमों की नजर टिकी है।
अगर अदालत से चुनाव का रास्ता साफ होता है तो शुक्ला इसे अपनी जीत बताएंगे।
अगर मामला और उलझता है तो विपक्ष सरकार को घेरने का मौका नहीं छोड़ेगा।

निष्कर्ष: विकास की जंग या सियासी शक्ति परीक्षण?
सिरौलीकला का मुद्दा अब सिर्फ नगर पालिका के चुनाव तक सीमित नहीं रहा।
यह सवाल बन चुका है—
क्या यह जनता के हक की लड़ाई है?
या अपनी ही सरकार के भीतर ताकत दिखाने का मंच?
क्या अदालत से पहले सड़क का रास्ता अपनाना उचित है?
किच्छा की राजनीति में यह टकराव आने वाले दिनों में और तीखा हो सकता है।
फिलहाल इतना तय है—सिरौलीकला अब विकास से ज्यादा सियासत का केंद्र बन चुका है।

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