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बाहरी दरिंदों से नहीं साहब.. अपनों से ही महफूज नहीं उधम सिंह नगर की बेटियां !

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पांच साल में 400 से ज्यादा मामलों में अजनबी नहीं, रिश्तेदार और परिचित ही बने हैवान

राजू अनेजा, काशीपुर।उधम सिंह नगर में बेटियों की सुरक्षा को लेकर हालात लगातार चिंताजनक होते जा रहे हैं। जिले में पिछले पांच वर्षों के दौरान पॉक्सो एक्ट और नाबालिगों के यौन उत्पीड़न के 400 से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं। आंकड़े बताते हैं कि हर वर्ष औसतन 90 से अधिक बच्चियां यौन अपराधों का शिकार हो रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सामाजिक बदनामी और पारिवारिक दबाव के कारण कई मामले पुलिस तक पहुंचते ही नहीं हैं। ऐसे में वास्तविक संख्या दर्ज मामलों से कहीं अधिक हो सकती है।

 

सबसे बड़ा खुलासा: अजनबी नहीं, रिश्तेदार और परिचित ही बन रहे हैवान

पुलिस रिकॉर्ड और चार्जशीट का विश्लेषण सबसे भयावह तस्वीर सामने लाता है। अधिकांश मामलों में आरोपी कोई बाहरी व्यक्ति नहीं, बल्कि रिश्तेदार, पड़ोसी, परिचित, पारिवारिक मित्र या आसपास रहने वाले लोग ही रहे हैं। जिन लोगों पर परिवार सबसे अधिक भरोसा करता है, वही कई मामलों में बच्चियों की मासूमियत के सबसे बड़े दुश्मन बनकर सामने आए। यही वजह है कि अब सवाल केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि समाज में टूटते भरोसे का भी है।

 

बदनामी के डर से दब जाते हैं कई मामले, सामने नहीं आ पाती पूरी सच्चाई

विशेषज्ञों का कहना है कि जो मामले दर्ज हुए हैं, वे पूरी तस्वीर नहीं हैं। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में सामाजिक बदनामी, परिवार की इज्जत और रिश्तों के टूटने के डर से कई परिवार शिकायत दर्ज ही नहीं कराते। कई बार बच्चियां भी डर, धमकी और मानसिक दबाव के कारण लंबे समय तक चुप रहती हैं। ऐसे में अपराधी खुलेआम घूमते रहते हैं और दूसरे बच्चों के लिए भी खतरा बने रहते हैं।

 

बिना सत्यापन के किरायेदार और लापरवाही भी बढ़ा रही खतरा

औद्योगिक जिले होने के कारण बड़ी संख्या में बाहरी लोग किराये पर रहते हैं। कई स्थानों पर आज भी पुलिस सत्यापन नहीं कराया जाता। वहीं कामकाजी परिवारों में माता-पिता के लंबे समय तक घर से बाहर रहने के कारण बच्चों की निगरानी कमजोर पड़ जाती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अपराधी इन्हीं परिस्थितियों का फायदा उठाते हैं।

 

हर पॉक्सो केस सिर्फ मुकदमा नहीं, एक मासूम का बिखरता बचपन है

यौन उत्पीड़न का शिकार होने वाली बच्चियां केवल अपराध नहीं झेलतीं, बल्कि उनका पूरा बचपन प्रभावित हो जाता है। पुलिस जांच, मेडिकल परीक्षण, अदालतों के चक्कर और समाज के सवाल उन्हें मानसिक रूप से तोड़ देते हैं। कई बच्चियां पढ़ाई छोड़ देती हैं, आत्मविश्वास खो देती हैं और लंबे समय तक मानसिक आघात से उबर नहीं पातीं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे बच्चों को न्याय के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक सहायता और सुरक्षित माहौल भी मिलना चाहिए।

 

सिर्फ पुलिस नहीं, पूरे समाज को निभानी होगी जिम्मेदारी

विशेषज्ञों का मानना है कि बेटियों की सुरक्षा केवल पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है। परिवार, स्कूल, मोहल्ला और समाज सभी को सतर्क रहना होगा। यदि किसी बच्चे के व्यवहार में अचानक डर, चुप्पी, घबराहट या असामान्य बदलाव दिखाई दे तो उसे नजरअंदाज करने के बजाय तुरंत संवाद और सहायता उपलब्ध करानी चाहिए। समय पर हस्तक्षेप कई बड़ी घटनाओं को रोक सकता है।

 

आंकड़ों में डरावनी तस्वीर

2021: 84 मामले

2022: 96 मामले

2023: 112 मामले

2024: 105 मामले

2025-26 (वर्तमान अवधि): 90–100 मामले

 

जिले को झकझोर देने वाले प्रमुख मामले

2022 (खटीमा): पिता ने अपनी नाबालिग बेटी से दुष्कर्म किया। गर्भवती होने पर मामला सामने आया।

2025 (सितारगंज): पड़ोसी ने 13 वर्षीय बच्ची को सुनसान स्थान पर ले जाकर दुष्कर्म किया।

अप्रैल 2026 (काशीपुर): चैती मेले से नाबालिग को बहला-फुसलाकर ले जाया गया और उसके साथ दुष्कर्म किया गया।

रुद्रपुर (लालपुर): होटल में 13 वर्षीय बच्ची से चाचा-भतीजे समेत चार आरोपियों द्वारा सामूहिक दुष्कर्म का मामला सामने आया।

 

क्या कहते हैं एसएसपी

“नाबालिग से दुष्कर्म के किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। हर अपराधी को जेल भेजा जाएगा और ऐसे मामलों में किसी भी प्रकार की लापरवाही बिल्कुल बर्दाश्त नहीं की जाएगी।”

— अजय गणपति, एसएसपी

 

“जब बेटियां अपने ही रिश्तों और भरोसे के बीच सुरक्षित नहीं हैं, तो समाज को सिर्फ अपराधियों से नहीं, अपनी सोच और लापरवाही से भी लड़ना होगा।”

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