हिमालय प्रहरी

रिश्तेदारों से ही सुरक्षित नहीं महिलाये गैरों का क्या, कहीं देवर तो कहीं सौतेला पिता ही बना दरिंदा

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ऊधम सिंह नगर बना महिला अपराधों का हॉटस्पॉट, 80% मामलों में अपने ही आरोपी; घर की चौखट के भीतर बढ़ता खतरा

राजू अनेजा ,कुमाऊं ब्यूरो।कुमाऊं में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर जो तस्वीर सामने आ रही है, वह बेहद भयावह और सोचने पर मजबूर करने वाली है। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि अब खतरा गैरों से कम और अपने ही रिश्तों से ज्यादा हो गया है। कहीं देवर, कहीं चाचा, तो कहीं पिता जैसे रिश्ते ही दरिंदगी की हदें पार करते नजर आ रहे हैं।
सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि ऊधम सिंह नगर अकेले महिला और बाल अपराधों का हॉटस्पॉट बन चुका है। पुलिस आंकड़ों के अनुसार, पूरे कुमाऊं में दर्ज मामलों का करीब 45 से 50 प्रतिशत हिस्सा इसी जिले से आता है। रुद्रपुर, काशीपुर, किच्छा और बाजपुर जैसे क्षेत्रों में घरेलू हिंसा, दुष्कर्म और पॉक्सो के मामलों में लगातार इजाफा हो रहा है।
दूसरे नंबर पर नैनीताल जिला है, जहां 25 से 30 प्रतिशत तक मामले दर्ज किए गए हैं। हल्द्वानी, लालकुआं और रामनगर क्षेत्रों में भी परिचितों और परिजनों द्वारा छेड़छाड़ और दुष्कर्म के मामलों में बढ़ोतरी साफ दिखाई दे रही है।
पहाड़ी जिलों की स्थिति और भी चौंकाने वाली है। अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ में 90 से 95 प्रतिशत मामलों में आरोपी कोई अनजान नहीं, बल्कि रिश्तेदार या करीबी ही निकला। यानी जिन पर भरोसा किया जाता है, वही भरोसा तोड़ रहे हैं।

डराने वाले आंकड़े
2020 से जनवरी 2026 तक 1500+ महिलाएं शिकार
2020 में 1030 मामले → 2023 में 1390
5 साल में 350-400 मामलों में आरोपी सगा/सौतेला परिजन
वयस्क मामलों में 80% आरोपी परिचित
पॉक्सो के 15–22% मामलों में आरोपी रिश्तेदार

रिश्तों की आड़ में दरिंदगी के मामले

कुमाऊं में बीते कुछ वर्षों में सामने आए मामलों ने समाज को झकझोर दिया—
सौतेले पिता द्वारा नाबालिग से दुष्कर्म
सगे चाचा और दादा पर शोषण के आरोप
चचेरे भाई द्वारा ब्लैकमेल कर दुष्कर्म
परिचितों द्वारा नाबालिग बच्चियों को निशाना बनाना
ये घटनाएं बताती हैं कि अपराधी बाहर नहीं, घर के भीतर ही मौजूद है।
प्रशासन के दावे, लेकिन सवाल कायम
एसएसपी अजय गणपति का कहना है कि महिलाओं की सुरक्षा और त्वरित न्याय के लिए पुलिस पूरी तरह सतर्क है और हर मामले में सख्त कार्रवाई की जा रही है।
इसके बावजूद आंकड़े यह साबित कर रहे हैं कि जमीनी स्तर पर हालात अभी भी गंभीर बने हुए हैं।
सबसे बड़ा सवाल
सरकार बेटियों को पढ़ाने और आगे बढ़ाने की योजनाएं चला रही है, लेकिन कुमाऊं में बहन-बेटियां अपने ही घरों में सुरक्षित नहीं हैं।
निष्कर्ष (कड़क पंचलाइन):
जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं,
तो फिर सुरक्षा की उम्मीद किससे की जाए?

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