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उत्तराखंड सियासत: 2027 का ‘ट्रेलर’ शुरू; राजभवन घेराव बनाम संगठनात्मक चक्रव्यूह

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उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव भले ही अभी दूर हों, लेकिन प्रदेश का सियासी पारा सातवें आसमान पर है। आज यानी 16 फरवरी 2026 को कांग्रेस का राजभवन कूच राज्य की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ माना जा रहा है। एक ओर भाजपा अपनी ‘चुनावी मशीनरी’ को धार दे रही है, तो दूसरी ओर कांग्रेस ‘सड़क से सत्ता’ तक का रास्ता खोजने में जुटी है।


🚩 कांग्रेस का ‘हल्ला बोल’: आज राजभवन कूच

कांग्रेस ने कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों को हथियार बनाकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है:

  • प्रमुख मुद्दे: पिछले 15 दिनों में देहरादून में हुई 5 हत्याएं, हल्द्वानी का दोहरा हत्याकांड, बेरोजगारी और महिला अपराध।

  • रणनीति: प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल, पूर्व अध्यक्ष प्रीतम सिंह और हरक सिंह रावत जैसे दिग्गज नेताओं की अगुवाई में हजारों कार्यकर्ता आज राजभवन का घेराव करने की तैयारी में हैं।

  • तनाव: परेड ग्राउंड की अनुमति न मिलने पर कांग्रेस ने घंटाघर पर जमा होकर विरोध करने की चेतावनी दी है, जिससे राजधानी में पुलिस बल की भारी तैनाती की गई है।


🛡️ भाजपा का ‘चुनावी चक्रव्यूह’: नड्डा का मंत्र और धामी के फैसले

भाजपा ने अपनी परंपरागत शैली में चुनाव से काफी पहले ही संगठन को सक्रिय कर दिया है:

  • जेपी नड्डा का दौरा: राष्ट्रीय अध्यक्ष ने हाल ही में कोर ग्रुप की बैठक लेकर ‘परफॉर्मेंस सर्वे’ और नए चेहरों पर मंथन किया है।

  • ध्रुवीकरण के मुद्दे: ‘मुस्लिम यूनिवर्सिटी’ और ‘धार्मिक पहचान’ जैसे मुद्दों की वापसी संकेत दे रही है कि 2027 में हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भाजपा के प्रमुख एजेंडे होंगे।

  • सरकारी सक्रियता: मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी मार्च के आगामी बजट सत्र में कुछ ‘लोकलुभावन’ विधेयक ला सकते हैं, जिन्हें चुनावी संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।


📊 सियासी विश्लेषण: 2027 की बिसात

पक्ष मुख्य रणनीति बड़ी चुनौती
भाजपा ‘डबल इंजन’ की उपलब्धियां और संगठनात्मक मजबूती। एंटी-इंकंबेंसी और कानून-व्यवस्था पर विपक्ष के हमले।
कांग्रेस जन-मुद्दों पर आक्रामक विरोध और एकजुटता का प्रदर्शन। गुटबाजी को खत्म करना और नेतृत्व की स्पष्टता।

🔍 निष्कर्ष

उत्तराखंड की राजनीति अब ‘वेट एंड वॉच’ की स्थिति से बाहर निकलकर ‘एक्शन’ मोड में आ चुकी है। 16 फरवरी का प्रदर्शन यह तय करेगा कि कांग्रेस जनता के गुस्से को वोट में बदलने में कितनी सक्षम है, वहीं भाजपा का संगठनात्मक ढांचा इस दबाव को कैसे झेलता है।

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