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लालकुआं में अगली पीढ़ी के लिए सियासी जमीन तैयार करने में जुटे प्रदेश के दो दिग्गज

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भाजपा में भगत सिंह कोश्यारी के भतीजे दीपेंद्र तो कांग्रेस में हरिश्चंद्र दुर्गापाल के पुत्र हेमवती नंदन को लेकर चर्चाएं तेज

 

एंटी इंकम्बेंसी और टिकट के समीकरणों ने बढ़ाई हलचल

राजू अनेजा, लालकुआं। उत्तराखंड की सबसे हाईप्रोफाइल विधानसभा सीटों में शामिल लालकुआं में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट अभी से सुनाई देने लगी है। चुनाव में अभी समय है, लेकिन सत्ता और संगठन दोनों ने अपनी-अपनी राजनीतिक बिसात बिछानी शुरू कर दी है। भाजपा और कांग्रेस के दो बड़े नेताओं की बढ़ती सक्रियता ने यह चर्चा तेज कर दी है कि इस बार दोनों दल अपनी राजनीतिक विरासत अगली पीढ़ी को सौंपने की तैयारी में हैं। यदि ऐसा हुआ तो लालकुआं का चुनाव केवल दो दलों के बीच नहीं, बल्कि दो राजनीतिक विरासतों की प्रतिष्ठा की लड़ाई भी बन सकता है।

 

भाजपा में भगतदा की सक्रियता के निकाले जा रहे राजनीतिक मायने

 

पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी पिछले कुछ समय से लालकुआं क्षेत्र में लगातार सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। सामाजिक, धार्मिक और संगठनात्मक कार्यक्रमों में उनकी बढ़ती मौजूदगी को राजनीतिक नजरिए से भी देखा जा रहा है। भाजपा के अंदर यह चर्चा लगातार चल रही है कि पार्टी यदि भविष्य की राजनीति को ध्यान में रखते हुए पीढ़ी परिवर्तन का फैसला करती है तो भगत सिंह कोश्यारी के भतीजे दीपेंद्र कोश्यारी का नाम प्रमुख दावेदारों में शामिल हो सकता है। हालांकि इस संबंध में पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन क्षेत्र में इसे लेकर चर्चाएं लगातार तेज हो रही हैं।

 

कांग्रेस में भी नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने की तैयारी

दूसरी ओर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं दो बार लालकुआं से विधायक रहे पूर्व कैबिनेट मंत्री हरिश्चंद्र दुर्गापाल भी लगातार क्षेत्र में सक्रिय हैं। कांग्रेस के कार्यक्रमों में उनके साथ पुत्र हेमवती नंदन दुर्गापाल की बढ़ती मौजूदगी को राजनीतिक विरासत से जोड़कर देखा जा रहा है। पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा है कि यदि कांग्रेस स्थानीय और युवा चेहरे पर दांव लगाती है तो हेमवती नंदन को बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है। हालांकि अंतिम फैसला पार्टी हाईकमान को करना है।

 

एंटी इंकम्बेंसी बनेगी सबसे बड़ा फैक्टर, क्या मौजूदा विधायक पर गिरेगी गाज?

 

भाजपा लगातार दो बार इस सीट पर जीत दर्ज कर चुकी है, लेकिन इस बार पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती एंटी इंकम्बेंसी को भी माना जा रहा है। क्षेत्र में राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार मौजूदा कार्यकाल को लेकर जनता के एक वर्ग में नाराजगी की बातें सुनाई दे रही हैं। राजस्व गांव का मुद्दा, विकास कार्यों की गति, स्थानीय समस्याएं और जन अपेक्षाओं को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। विपक्ष भी इन्हीं मुद्दों को चुनावी हथियार बनाने की तैयारी में है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा मौजूदा विधायक मोहन सिंह बिष्ट पर इस बार भी भरोसा जताएगी या फिर जनता के मूड और बदलते राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए नया चेहरा सामने लाएगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि पार्टी को एंटी इंकम्बेंसी का खतरा महसूस होता है तो टिकट वितरण में बड़ा फैसला लिया जा सकता है। वहीं यदि पार्टी मौजूदा विधायक के प्रदर्शन को पर्याप्त मानती है तो उन्हें एक और मौका भी मिल सकता है। फिलहाल यह सवाल भाजपा के भीतर सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है।

 

भाजपा में टिकट की दौड़ आसान नहीं

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि लालकुआं सीट पर भाजपा का टिकट इस बार सबसे अधिक चर्चित रहने वाला है। एक तरफ मौजूदा विधायक हैं, दूसरी ओर भविष्य के नेतृत्व को तैयार करने की चर्चा है। ऐसे में संगठन को जीत, जनाधार, स्थानीय समीकरण और भविष्य की रणनीति—सभी पहलुओं पर संतुलन बनाना होगा। यही वजह है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की हर गतिविधि पर स्थानीय कार्यकर्ताओं की नजर बनी हुई है।

 

कांग्रेस की चुनौती—संगठन को एकजुट कर सत्ता विरोधी माहौल का लाभ उठाना

कांग्रेस पिछले दो विधानसभा चुनावों में इस सीट पर हार का सामना कर चुकी है। ऐसे में पार्टी इस बार कोई चूक नहीं करना चाहती। यदि कांग्रेस अपने संगठन को एकजुट रखने में सफल रहती है और स्थानीय मुद्दों को प्रभावी ढंग से जनता के बीच ले जाती है तो मुकाबला कड़ा हो सकता है। पार्टी की कोशिश सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में भुनाने की रहेगी।

 

विरासत बनाम प्रदर्शन की होगी सीधी लड़ाई

2027 का चुनाव इस बात का भी फैसला करेगा कि राजनीतिक दल अनुभव और मौजूदा प्रदर्शन को प्राथमिकता देते हैं या फिर नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने का जोखिम उठाते हैं। यदि भाजपा और कांग्रेस दोनों नए चेहरों पर दांव खेलती हैं तो लालकुआं का चुनाव दो राजनीतिक विरासतों के बीच सीधी टक्कर बन जाएगा। वहीं यदि पुराने चेहरों पर भरोसा कायम रहता है तो मुकाबला अनुभव बनाम चुनौती के रूप में देखा जाएगा।

 

अभी पत्ते बंद, लेकिन सियासी बिसात पूरी तरह बिछ चुकी है

भले ही भाजपा और कांग्रेस ने अभी अपने उम्मीदवारों को लेकर कोई संकेत न दिया हो, लेकिन लालकुआं की राजनीति में हलचल तेज हो चुकी है। नेताओं की सक्रियता, लगातार बढ़ते जनसंपर्क, अंदरूनी बैठकों और टिकट को लेकर चल रही चर्चाओं ने साफ कर दिया है कि 2027 की लड़ाई की तैयारी शुरू हो चुकी है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या भाजपा एंटी इंकम्बेंसी के खतरे को देखते हुए बड़ा दांव खेलेगी और क्या कांग्रेस इस मौके का पूरा राजनीतिक लाभ उठा पाएगी।

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