
राजू अनेजा,रुद्रपुर। त्रिशूल चौक पर त्रिशूल के अनावरण का कार्यक्रम आस्था का प्रतीक बनना था, लेकिन शीला पट्ट पर स्थानीय विधायक शिव अरोड़ा का नाम न होने से यह मामला सियासी संग्राम में बदल गया। जिले से लेकर प्रदेश तक चर्चाओं का बाजार गर्म हुआ तो आखिरकार मेयर विकास शर्मा को सफाई देनी पड़ी।मगर सफाई ने आग बुझाने के बजाय और हवा दे दी।
“मेयर का प्रोटोकॉल सबसे बड़ा”
मेयर ने दो टूक कहा—“चर्चा फैलाने वालों को प्रोटोकॉल का ज्ञान नहीं है। हमने पूरा प्रोटोकॉल फॉलो किया है। मेयर का प्रोटोकॉल बड़ा होता है।”
उन्होंने आगे कहा कि आदरणीय बेहड़ जी, आदरणीय शिव अरोड़ा जी और हमारे सांसद जी—सभी नगर निगम बोर्ड के सदस्य हैं, और वह स्वयं उस बोर्ड के अध्यक्ष हैं।
यहीं से सवालों का नया सिलसिला शुरू हो गया।
बयान में उलझे तर्क?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि प्रोटोकॉल की ही कसौटी थी, तो फिर विधायक ही नहीं बल्कि सांसद अजय भट्ट का नाम भी शीला पट्ट पर होना चाहिए था। मेयर ने खुद सांसद का जिक्र कर बहस को नया आयाम दे दिया।
यानी तर्क देते-देते मामला और उलझता नजर आया।
क्या यह महज प्रशासनिक चूक थी?
या फिर स्थानीय सियासत में वरीयता की सूक्ष्म लड़ाई?
“ क्या शहर के हर पत्थर पर उनका नाम नाम होना चाहिए?” — तंज ने बढ़ाया ताप
नाम को लेकर उठे सवालों पर मेयर का तंज—“अब क्या शहर के हर पत्थर पर उनका नाम होना चाहिए?”—अब शहर की सियासत में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बन गया है।
इस बयान को कई लोग सीधे तौर पर विधायक समर्थकों को जवाब मान रहे हैं। वहीं विपक्ष इसे सत्ता के भीतर समन्वय की कमी का संकेत बता रहा है।
शिव की चुप्पी, पर सियासी तांडव तय?
विधायक शिव अरोड़ा की ओर से अब तक कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। लेकिन उनकी खामोशी को राजनीतिक संदेश माना जा रहा है।
त्रिशूल चौक पर लगा त्रिशूल भले ही स्थिर है, लेकिन उसके आसपास खड़ी राजनीति डगमगाती दिखाई दे रही है।
आस्था के मंच पर शुरू हुआ यह विवाद अब प्रतिष्ठा, प्रोटोकॉल और राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन की लड़ाई में बदल चुका है।
फिलहाल शहर में एक ही सवाल गूंज रहा है—
क्या यह विवाद यहीं थमेगा या आने वाले दिनों में रुद्रपुर की राजनीति में और बड़ा सियासी तांडव देखने को मिलेगा?
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