
राजू अनेजा, काशीपुर।2027 के विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन काशीपुर की राजनीति में सियासी हलचल तेज़ हो चुकी है। राजनीतिक मोहरें खिसकने लगी हैं और हर गतिविधि के पीछे आने वाले चुनाव की आहट साफ़ महसूस की जा सकती है।
भारतीय जनता पार्टी में अब तक काशीपुर विधानसभा सीट पर चीमा परिवार का वर्चस्व निर्विवाद रहा है। चार बार विधायक रहे हरभजन सिंह चीमा के बाद उनके पुत्र त्रिलोक सिंह चीमा ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। संगठनात्मक पकड़ और चुनावी अनुभव के चलते आज भी उन्हें मजबूत दावेदार माना जा रहा है।
लेकिन राजनीति में स्थायित्व कम और संभावनाएं अधिक होती हैं।
बीते कई चुनावों से भाजपा टिकट की दौड़ में शामिल रहे पीसीयू अध्यक्ष राम मल्होत्रा इस बार भी पूरे आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतरने को तैयार दिखाई दे रहे हैं। वे साफ कह चुके हैं कि दावेदारी उनकी है, अंतिम फैसला पार्टी का होगा—और जिसे टिकट मिलेगा, सभी कार्यकर्ता एकजुट होकर उसे जिताने का काम करेंगे।
इसी बीच काशीपुर की सियासत में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बनी है राम मल्होत्रा और महापौर दीपक बाली की बढ़ती नजदीकियां। कभी महापौर बाली के विरोधी माने जाने वाले राम मल्होत्रा का आज हर मंच पर उनके साथ दिखाई देना राजनीतिक गलियारों में कई संकेत दे रहा है।
राजनीतिक हलकों में यह सवाल लगातार गूंज रहा है कि जो राम कभी चीमा खेमे के साथ खड़े नजर आते थे, वे अब बाली के इतने करीब क्यों दिख रहे हैं? क्या यह बदले हुए राजनीतिक समीकरणों की शुरुआत है या फिर 2027 की चुनावी रणनीति का हिस्सा?
नगर निगम का ताज संभालने के बाद महापौर दीपक बाली ने महज एक वर्ष के भीतर ही काशीपुर की जनता के बीच भरोसे और स्वीकार्यता का मजबूत आधार तैयार कर लिया है। विकास कार्यों, संवाद और सक्रियता के चलते आज वे सिर्फ नगर सरकार तक सीमित नहीं रह गए हैं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के करीबी माने जाने वाले महापौर दीपक बाली आज सत्ता के गलियारों के साथ-साथ काशीपुर की जनता के दिलों में भी मजबूती से जगह बना चुके हैं। ऐसे में 2027 की विधानसभा जंग में उनकी मित्रता हर दावेदार के लिए राजनीतिक संजीवनी से कम नहीं मानी जा रही—और यही वजह है कि बाली आज काशीपुर की सियासत के केंद्र में हैं।
यही कारण है कि अब यह सवाल और गहराता जा रहा है—क्या दीपक बाली की बढ़ती लोकप्रियता राम मल्होत्रा के लंबे सियासी वनवास को खत्म करने का जरिया बनेगी?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राम मल्होत्रा इस बार केवल दावेदारी तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि निर्णायक मुकाबले के इरादे से आगे बढ़ रहे हैं। उनकी सक्रियता और बाली से बढ़ती नजदीकियां इसी रणनीति का संकेत देती हैं।
रामायण की तरह जब लक्ष्य बड़ा हो, तो मित्रता भी निर्णायक भूमिका निभाती है। काशीपुर की राजनीति में अब देखना दिलचस्प होगा कि राम और बाली की यह मित्रता 2027 में नया इतिहास रचती है या फिर परंपरागत सियासी समीकरण एक बार फिर भारी पड़ते हैं।
फिलहाल तस्वीर साफ़ नहीं है, लेकिन इतना तय है—इस बार काशीपुर की सियासत बेहद दिलचस्प होने वाली है।