नई दिल्ली: सीपीआई नेता और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार और गुजरात के निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवानी ने कांग्रेस का दामन थाम लिया है.

इस दौरान कांग्रेस नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा कि इन्होंने(कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवानी) लगातार मोदी सरकार और हिटलरशाही की नीति के खिलाफ संघर्ष किया. हमारे इन साथियों को लगा कि ये आवाज और बुलंद हो पाएगी जब ये कांग्रेस और राहुल गांधी की आवाज में मिलकर एक और एक ग्यारह की आवाज बन जाएगी.
इस दौरान कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने कहा कि हम इन युवा नेताओं कुमार और मेवानी के साथ काम करने को लेकर आशान्वित हैं, ताकि देश पर शासन कर रही फासीवादी ताकतों को हरा सकें.’ वेणुगोपाल ने कहा कि कन्हैया कुमार इस देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की लड़ाई के प्रतीक हैं. उन्होंने एक छात्र नेता के रूप में कट्टरवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ी. इस तरह के गतिशील व्यक्तित्व के शामिल होने से कांग्रेस का पूरा कैडर उत्साह से भर जाएगा.
बता दें हाल ही में कन्हैया कुमार ने राहुल गांधी से मुलाकात की थी, जिसके बाद से ही राजनीतिक गलियारे में अटकलें तेज हो गई थीं.
कन्हैया की मोदी विरोध पहचान
कन्हैया कुमार छात्र आंदोलन से निकले हैं. सीपीआई के छात्र संगठन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन से जुड़े हुए रहे हैं. वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के अध्यक्ष रह चुके हैं. उन्होंने पिछले लोकसभा चुनाव में बिहार के बेगूसराय से चुनाव लड़ा था और बीजेपी के उम्मीदवार गिरिराज सिंह से हार गए थे. 2016 में कन्हैया कुमार का जेएनयू अवतार काफी पॉपुलर हुआ था. राष्ट्रदोह कानून के खिलाफ आंदोलन, भड़काऊ भाषण, गिरफ्तारी के बाद कन्हैया वामपंथी राजनीति का नया चेहरा बनकर उभरे थे.
जेएनयू से निकलने के बाद कन्हैया कुमार ने सीपीआई जॉइन की थी. 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने बेगूसराय से बीजेपी के गिरिराज के खिलाफ ताल ठोंकी थी मगर करीब 22 प्रतिशत वोट हासिल करने के बावजूद वह हार गए थे. बेगूसराय में भूमिहार जाति के मतदाताओं की संख्या सबसे ज्यादा है और कन्हैया कुमार भी भूमिहार हैं.
जिग्नेश मेवानी दलित आंदोलन का चेहरा
जिग्नेश मेवानी दलित आंदोलन का चेहरा रहे हैं. राजनीति में आने से पहले वह पत्रकार, वकील थे और फिर दलित एक्टिविस्ट बने और अब नेता हैं. मेवानी तब अचानक सुर्खियों में आए थे जब उन्होंने वेरावल में उना वाली घटना के बाद घोषणा की थी कि अब दलित लोग समाज के लिए मरे हुए पशुओं का चमड़ा निकालने, मैला ढोने जैसा ‘गंदा काम’ नहीं करेंगे. इसके बाद से मेवानी देशभर की सुर्खियों में रहे हैं. वो अक्सर प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों की आलोचना करते रहे हैं.
राहुल के करीबी छोड़ रहे कांग्रेस
वहीं, कांग्रेस में युवा नेता पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी या अन्य दलों का दामन थाम रहे हैं. ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, सुष्मिता देव, अशोक तंवर, प्रियंका चतुर्वेदी, ललितेशपति त्रिपाठी जैसे कई युवा नेता कांग्रेस छोड़कर चले गए. ये सभी ऐसे नाम हैं, जिन्हें राहुल गांधी के सबसे प्रमुख करीबियों में गिना जाता था. राहुल के इस यूथ ब्रिगेड को कांग्रेस के भविष्य का चेहरा माना जाता था. इसके बाद भी कांग्रेस इन्हें पार्टी में रोककर नहीं रख सकी.
कांग्रेस में एक के बाद एक कई युवा नेता पार्टी छोड़ रहे हैं तो दूसरी तरफ गुलाम नबी आजाद सहित तमाम बुजुर्ग नेता पार्टी में साइड लाइन हैं. माना जा रहा है कि युवा नेताओं के जाने से पैदा हुए वैक्यूम को भरने के लिए कांग्रेस कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवानी की एंट्री हुई है. दोनों ही नेता युवा हैं, आंदोलन से निकले हैं और अपनी पीढ़ी के युवाओं के बीच अच्छी पकड़ भी रखते हैं. ऐसे में माना जा रहा है कि कांग्रेस कन्हैया, जिग्नेश और हार्दिक जैसे नेताओं की ‘आउटसोर्स’ करके युवाओं की पार्टी न रहने का ठप्पा हटाना चाहती है.
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