कांग्रेस में गहराता अंदरूनी कलह: प्रभारी शैलजा की चेतावनी के बाद भी हरीश रावत ने जारी रखी ‘जनसंवाद यात्रा’; 7 अक्टूबर को दिल्ली बुलावा

देहरादून। उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ ही मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के भीतर की अंदरूनी गुटबाजी और सियासी घमासान एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है। एक तरफ पार्टी का शीर्ष नेतृत्व राज्यभर में एकजुटता का संदेश देने और चुनावी तैयारियों को मजबूत करने में जुटा हुआ है, तो वहीं दूसरी ओर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री व वरिष्ठ कांग्रेस नेता हरीश रावत अपनी अलग ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ निकालकर संगठन के समानांतर अपनी धुरी मजबूत कर रहे हैं। कांग्रेस प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा की ओर से लिखित पत्र के जरिए इस यात्रा को तुरंत रोकने की सख्त नसीहत दिए जाने के बावजूद हरदा पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। इस खींचतान के बीच अब 7 अक्टूबर को दिल्ली में हरीश रावत की पार्टी के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री केसी वेणुगोपाल और प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा से अहम बैठक प्रस्तावित है।
‘जनसंवाद यात्रा’ या अपनी सियासी धमक और पारिवारिक जमीन मजबूत करने की कवायद?
हरीश रावत लगातार यह रुख अपनाए हुए हैं कि उनकी यह यात्रा पूरी तरह गैर-राजनीतिक है और वे गंभीर बीमारी के बाद प्रदेश की जनता व देवी-देवताओं का आभार व्यक्त करने के लिए निकले हैं। हालांकि, प्रदेश संगठन के समानांतर यात्रा चलाने और प्रभारी की चेतावनी को दरकिनार करने के चलते पार्टी के भीतर असंतोष गहराता जा रहा है। रावत ने तर्क दिया है कि यह कांग्रेस का आधिकारिक कार्यक्रम नहीं है, लेकिन राज्य का हर कार्यकर्ता इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल एक आभार यात्रा नहीं है, बल्कि इसके पीछे हरीश रावत की अपने परिवार के लिए अगली पीढ़ी की राजनीतिक जमीन तैयार करने की मंशा छिपी है:
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बेटे आनंद रावत की दावेदारी: हरीश रावत अपने बेटे आनंद रावत के लिए सार्वजनिक रूप से चुनावी टिकट की पैरवी कर चुके हैं। उनका कहना है कि यदि पार्टी को लगता है कि आनंद डीडीहाट जैसी कठिन या कांग्रेस की कमजोर सीटों पर जीत दिला सकते हैं, तो उन्हें चुनावी मैदान में उतारा जाना चाहिए।
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‘एक परिवार, एक टिकट’ का पेंच: रावत की बेटी अनुपमा रावत पहले से ही हरिद्वार ग्रामीण से विधायक हैं। ऐसे में यदि अनुपमा को दोबारा मौका मिलता है और बेटे आनंद को भी प्रत्याशी बनाया जाता है, तो पार्टी का पुराना ‘एक परिवार, एक टिकट’ फॉर्मूला आड़े आ सकता है।
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हरिद्वार और खानपुर में सक्रियता: स्वयं हरीश रावत द्वारा हरिद्वार से चुनाव लड़ने के संकेतों और खानपुर सीट से दूसरे बेटे वीरेंद्र की राजनीतिक सक्रियता के बीच इस यात्रा को संगठन के भीतर अपनी मजबूत स्थिति और शर्तों को मनवाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
इतिहास गवाह है: आलाकमान से हरदा के उतार-चढ़ाव वाले रिश्ते
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, हरीश रावत और कांग्रेस आलाकमान के रिश्तों में खिंचाव की यह कहानी नई नहीं है। वर्ष 2012 के चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद रावत मुख्यमंत्री पद के मुख्य दावेदार थे, लेकिन हाईकमान ने विजय बहुगुणा के सिर ताज सजा दिया था, जिससे उनके समर्थकों का आक्रोश सड़क पर आ गया था। बाद में 2014 में वे मुख्यमंत्री बने। 2022 के चुनावों में भी चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष रहने के बावजूद नेतृत्व और टिकट वितरण को लेकर खींचतान जारी रही। अब 2027 के चुनाव से पहले जब उनके पास संगठन में कोई औपचारिक बड़ी जिम्मेदारी नहीं है, तब भी वे राज्य की राजनीति का मुख्य केंद्र बने रहने में सफल दिख रहे हैं।
भाजपा का तीखा तंज; 7 अक्टूबर को दिल्ली बैठक पर टिकीं निगाहें
कांग्रेस के इस अंदरूनी घमासान पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने तीखा हमला बोला है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने चुटकी लेते हुए कहा कि, “हरीश रावत की इस यात्रा से उनके अपने ही पार्टी के लोग सबसे ज्यादा परेशान हैं। रावत सिर्फ आगामी चुनाव में अपने परिवार को सेट करने की जुगत में हैं। चुनाव से पहले ही जिस पार्टी में इतनी सिर-फुटव्वल हो रही है, उसे जनता अच्छी तरह देख रही है।”
फिलहाल, पूरी उत्तराखंड कांग्रेस और राजनीतिक गलियारों की निगाहें 7 अक्टूबर को दिल्ली में होने वाली हाई-प्रोफाइल बैठक पर टिकी हैं। अब देखना यह होगा कि केसी वेणुगोपाल और कुमारी शैलजा के साथ बैठक के बाद हरीश रावत अपनी यात्रा रोकते हैं या अपनी शर्तों पर आगे बढ़ते हैं।
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