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दल-बदल के बहाने आने वाले दिनों में प्रदेश में प्रेशर पॉलिटिक्स का खेल, CM धामी पर बढ़ा दबाव

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देहरादून: मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए अब आने वाले दिन आसान नहीं होने वाले हैं. माना जा रहा है कि प्रदेश में अब प्रेशर पॉलिटिक्स बेहद ज्यादा हावी रहने वाली है. ऐसा हाल ही में हुए दल-बदल को लेकर माना जा रहा है. प्रेशर पॉलिटिक्स के तहत न केवल कांग्रेस से भाजपा में आए बागी सरकार पर हावी रहेंगे. बल्कि भाजपा के कुछ पुराने नेता भी धामी सरकार के लिए चुनौती बन सकते हैं.

पिछले दिनों कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य और उनके बेटे संजीव आर्य का कांग्रेस में जाना यूं तो दलबदल के तहत एक सामान्य घटनाक्रम के रूप में देखा जा सकता है. लेकिन इसका असर केवल राजनीतिक रूप से चुनाव पर ही नहीं होगा, बल्कि अब पुष्कर सिंह धामी को सरकार चलाना भी खासा मुश्किल हो सकता है.

दरअसल, यशपाल आर्य और संजीव आर्य ने जिस तरह अचानक पार्टी को अलविदा कहा है उसके बाद हरक सिंह रावत समेत बाकी बाकी भी प्रेशर पॉलिटिक्स के तहत सरकार की नींद हराम कर सकते हैं. हालांकि भारतीय जनता पार्टी पहले ही इस घटनाक्रम के बाद परेशानी में दिखती रही है. लेकिन यह परेशानी आने वाले दिनों में कुछ और भी ज्यादा बढ़ती हुई दिखाई देगी.

उत्तराखंड भाजपा में ऐसे कई चेहरे हैं जो सरकार के लिए चुनौती बन सकते हैं. इसमें हरक सिंह रावत, सतपाल महाराज, उमेश शर्मा काऊ, कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन, प्रदीप बत्रा, केदार सिंह रावत, बिशन सिंह चुफाल समेत कुमाऊं के कुछ भाजपाई धामी सरकार के लिए परेशानी खड़ी कर सकते हैं.

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परेशानी खड़ी करने वालों में वह लोग भी होंगे, जो भाजपा से इस बार अपने टिकट को कटता हुआ पाएंगे. लेकिन भारतीय जनता पार्टी को चिंता हरक सिंह और उनके गुट से है. क्योंकि अगर हरक सिंह पार्टी छोड़ते हैं तो भारतीय जनता पार्टी के लिए एक बड़ी मुश्किल खड़ी हो सकती है.

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प्रेशर पॉलिटिक्स में बागी मनवा सकते हैं अपनी बात: यशपाल आर्य के जाने के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक पर सबसे ज्यादा दबाव है. दरअसल, यह दबाव इसलिए है क्योंकि यह प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर मदन कौशिक और मुख्यमंत्री के तौर पर पुष्कर सिंह धामी के लिए पार्टी के नेताओं को एकजुट रखना बड़ी चुनौती है. इस पॉलिटिक्स के तहत एक मंत्री पद खाली होने के चलते अब उमेश शर्मा काऊ या किसी बागी को मंत्री बनाए जाने का दबाव होगा.

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शासन में अपनी विभिन्न फाइलों को मुख्यमंत्री से अनुमति दिलाने का भी आने वाले दिनों में भारी दबाव होगा. अपनी विधानसभाओं में ज्यादा बजट खर्च करवाने का भी बागी दबाव बनाएंगे. खास बात यह है कि पुष्कर सिंह धामी से वरिष्ठ विधायक और मंत्री पहले ही पार्टी हाईकमान के धामी को मुख्यमंत्री बनाने के निर्णय से नाराज दिखाई दिए थे. लिहाजा यह एक ऐसा समय होगा जब पुष्कर सिंह धामी पर दबाव बनाकर अपनी तमाम बातों को मनवाने की कोशिश इन नेताओं की तरफ से की जाएगी.

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ऐसा कहना कोई अनुमान नहीं है कि अब प्रदेश में बागी प्रेशर पॉलिटिक्स करेंगे. इससे पहले भी तमाम पार्टी के नेता भाजपा में प्रेशर पॉलिटिक्स को अपनाते रहे हैं. त्रिवेंद्र सिंह रावत को हटाने के बाद नई कैबिनेट के गठन में मंत्री पद पाने का दबाव हो या फिर पुष्कर सिंह धामी के मुख्यमंत्री बनने के बाद अपने विभागों में इजाफा करने का दबाव सभी जगह बागी सरकार पर हावी होते हुए दिखाई दिए हैं.

इसके अलावा हरक सिंह रावत अपने मन मुताबिक फाइलों को निपटाने और सतपाल महाराज अपने हिसाब से विभाग को चलाने का भी सरकार पर दबाव बनाते रहे हैं. उधर अपने विभागों में मनमाफिक अधिकारियों की तैनाती का भी सरकार पर मंत्रियों की तरफ से दबाव बनाया गया था.

प्रदेश में इस मामले को लेकर भारतीय जनता पार्टी के नेता कहते हैं कि पुष्कर सिंह धामी को यदि कोई अनुभवहीन समझता है तो यह उसकी गलती है. जिन लोगों को भी पार्टी से जाना है ऐसे लोगों के लिए पार्टी के दरवाजे खुले हैं जो आना चाहते हैं वह आ सकते हैं और जो जाना चाहते हैं वह जा सकते हैं.

भारतीय जनता पार्टी के अंदर चल रही राजनीतिक सरगर्मियां को कांग्रेस काफी बारीकी से देख रही है. इसी लिहाज से अपने आगामी कार्यक्रमों और रणनीतियों को भी तय कर रही है. कांग्रेस के नेता कहते हैं कि भाजपा में प्रेशर पॉलिटिक्स कोई नई बात नहीं है. तमाम मौकों पर हरक सिंह रावत और उनके सहयोगी भाजपा सरकार पर दबाव बनाते हुए दिखाई दिए हैं. अब चुनाव में इन सभी बातों का भाजपा को हिसाब भी देना होगा.

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राजनीतिक रूप से विरोधी इस मौके को हाथ से नहीं जाने देना चाहती, उधर आम आदमी पार्टी भी खुद को चुनावी मैदान में होने का संदेश देने के लिए भाजपा पर पुरजोर वार कर रही है. आम आदमी पार्टी के अमरेन्द्र बिष्ट कहते हैं कि भाजपा ब्लैकमेलर पार्टी है. भारतीय जनता पार्टी में ब्लैक मेलिंग कर अपनी बात को मनाना एक सामान्य प्रक्रिया है.

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