हिमालय प्रहरी

एक किडनी के सहारे जी रही लाचार महिला का हुआ सफल घुटना प्रत्यारोपण, 6 साल बाद अपने पैरों पर खड़ी हुईं पार्वती

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श्रीनगर गढ़वाल: पहाड़ के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में गंभीर बीमारियां अक्सर जिंदगी को लाचार बना देती हैं, लेकिन बेस चिकित्सालय श्रीकोट-श्रीनगर में डॉक्टरों ने एक ऐसा सफल ऑपरेशन किया है जो किसी चमत्कार से कम नहीं है। बागेश्वर जनपद के खरई-लोब गांव की 45 वर्षीय पार्वती देवी पिछले छह वर्षों से गंभीर गठिया (ऑस्टियोआर्थराइटिस) के कारण रेंगकर जीने को मजबूर थीं और पिछले छह महीनों से पूरी तरह बिस्तर पर थीं। उनकी चुनौती इसलिए भी बड़ी थी क्योंकि उनके शरीर में जन्म से सिर्फ एक ही किडनी काम कर रही थी। इस बेहद संवेदनशील और जटिल स्थिति को देखते हुए हड्डी रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. दयाकृष्ण टम्टा और उनकी टीम ने विशेष चिकित्सकीय प्रोटोकॉल के तहत आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत उनका पूरी तरह निःशुल्क सफल ऑपरेशन किया। दोनों घुटनों के सफल प्रत्यारोपण (टोटल नी रिप्लेसमेंट) के बाद जब पार्वती देवी ने बिना किसी सहारे के अपने कदम बढ़ाए, तो उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े। उन्होंने भावुक होकर कहा कि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि वह कभी सामान्य जीवन की तरफ कदम बढ़ा सकेंगी।

पार्वती देवी के दोनों घुटने गठिया के कारण पूरी तरह क्षतिग्रस्त होकर मुड़ चुके थे। बीती 2 जून को उन्हें अस्पताल लाया गया था, जहां जांच में एक ही किडनी होने की बात सामने आने पर एनेस्थीसिया देना और ऑपरेशन करना बेहद जोखिम भरा था। डॉ. टम्टा ने बताया कि किडनी की संवेदनशीलता को देखते हुए दवाओं का विशेष चयन किया गया और 12 दिनों की तैयारी के बाद 16 जून को चार घंटे से अधिक समय तक चले जटिल ऑपरेशन में दोनों घुटनों का सफल प्रत्यारोपण किया गया। फिजियोथेरेपी और डॉक्टरों की कड़ी निगरानी के बाद अब महिला पूरी तरह चलने-फिरने लगी हैं और रविवार को उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी जाएगी। इस मुश्किल सफर में पार्वती देवी के देवर मनोज कुमार, ग्राम प्रधान बीना देवी और बड़ी बहन बिमला ने उनका पूरा साथ दिया, जिसके लिए पार्वती ने सभी का आभार जताया।

बता दें कि पार्वती देवी के घर की परिस्थितियां बेहद भावुक करने वाली हैं। उनके पति शेखर चंद पिछले 15 वर्षों से लकवाग्रस्त हैं और दोनों हाथ-पैर के बल घिसटकर चलते हैं। जब पार्वती भी बिस्तर पर आ गईं, तो पूरे परिवार की जिम्मेदारी उनकी 14 वर्षीय इकलौती बेटी निहारिका के कंधों पर आ गई। कक्षा दसवीं में पढ़ने वाली निहारिका रोजाना स्कूल के लिए छह किलोमीटर पैदल दूरी तय करने के साथ-साथ माता-पिता की सेवा भी कर रही है। अब मां के ठीक होने से इस संघर्षपूर्ण परिवार को एक नई उम्मीद मिली है।

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