(अल्मोड़ा): उत्तराखंड के द्वाराहाट विकासखंड का मल्याल गाँव अपनी एक अनोखी परंपरा के कारण चर्चा में है। जहाँ होली पर नशे का चलन आम होता जा रहा है, वहीं इस गाँव ने पिछले 20 वर्षों से नशा मुक्त होली का संकल्प निभाया है। यहाँ की होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और अनुशासन की एक अनूठी मिसाल है।
दो दशक पहले का वो कड़ा फैसला
गाँव के बुजुर्गों और ग्रामीणों के अनुसार, करीब 20 साल पहले होली के दौरान नशे में धुत होकर गाली-गलौज और मारपीट की घटनाएं आम थीं। गाँव के पवित्र उत्सव की मर्यादा धूमिल हो रही थी। तब ग्रामीणों ने एक ऐतिहासिक आम सभा बुलाई और सर्वसम्मति से नियम बनाए:
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पूर्ण प्रतिबंध: एकादशी से लेकर होली के अंतिम दिन तक शराब, बीड़ी और किसी भी प्रकार का नशा वर्जित रहेगा।
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अनोखी सजा: यदि कोई व्यक्ति नशे में पाया जाता है, तो पहले उसके परिजनों को सूचित किया जाता है। इसके बावजूद यदि वह नहीं सुधरता, तो उसे नशा उतरने तक गाँव की ‘गौशाला’ में बंद कर दिया जाता है।
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सामाजिक बहिष्कार: नियमों का उल्लंघन करने वालों का सामूहिक बहिष्कार किया जाता है, जिसके डर से आज यहाँ का बच्चा-बच्चा अनुशासन में रहता है।
एकादशी से शुरू होती है भक्ति की गंगा
मल्याल गाँव में होली का पर्व एकादशी के दिन पधान (ग्राम प्रधान) के घर ‘चीर बंधन’ के साथ शुरू होता है।
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सामूहिक पूजा: हर घर से श्रद्धालु अबीर, गुलाल, अक्षत और लाल-पीले वस्त्र लेकर पहुँचते हैं। भगवान गणेश की पूजा के बाद होलिका को देवी स्वरूपा मानकर जाग्रत किया जाता है।
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पारंपरिक राग: शाम को कालिका और भूमिया मंदिर में ग्रामीण इकट्ठा होते हैं। यहाँ महिलाएं और पुरुष पारंपरिक कुमाऊँनी रागों में होली गाते हैं।
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प्रसाद वितरण: हर परिवार द्वारा चढ़ाए गए गुड़ और दक्षिणा से ‘हलवा’ तैयार कर प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।
घर-घर जाकर आशीष देते ‘होल्यार’
चीर बंधन के बाद गाँव के होल्यार (होली गाने वाले) पारंपरिक गीतों के साथ गाँव के हर घर की देहरी तक पहुँचते हैं। यहाँ न हुड़दंग होता है और न ही शोर-शराबा, बल्कि आशीष और शुभकामनाओं के साथ होली का आनंद लिया जाता है।
मल्याल गाँव की होली: एक नज़र में
| विशेषता | विवरण |
| अवधि | एकादशी से होली के अंतिम दिन तक |
| मुख्य नियम | शराब, बीड़ी और हर तरह का नशा प्रतिबंधित |
| सजा का प्रावधान | परिजनों को बुलाना या गौशाला में बंद करना |
| मुख्य परंपरा | पधान के घर चीर बंधन और पारंपरिक होली गायन |
| प्रतीक | अनुशासन, समरसता और सांस्कृतिक गौरव |
निष्कर्ष: मल्याल गाँव ने यह साबित कर दिया है कि अगर समाज ठान ले, तो कुरीतियों को जड़ से मिटाकर त्योहारों की पवित्रता को बचाया जा सकता है। आज जब होली का स्वरूप बदल रहा है, मल्याल गाँव की ‘शालीन होली’ उत्तराखंड की संस्कृति का असली चेहरा पेश करती है।
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