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लालकुआ:भाजपा के विजयी रथ को रोकने की जंग में कौन बनेगा काँग्रेस का खेवनहार?

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राजू अनेजा,लालकुआं विधानसभा एक बार फिर सियासी मंथन के केंद्र में है। पिछली बार “लोकल बनाम बाहरी” के मुद्दे पर जनता ने बड़ा फैसला सुनाया और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को नकारते हुए भाजपा के मोहन सिंह बिष्ट को जीत का सेहरा पहनाया। अब कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है—भाजपा के मजबूत रथ को रोकने के लिए आखिर लालकुआं से कौन होगा सबसे भरोसेमंद चेहरा?
कांग्रेस के भीतर दावेदारों की लंबी फेहरिस्त है, लेकिन मैदान में वही टिकेगा जो संगठन, संघर्ष और जमीन—तीनों कसौटियों पर खरा उतरे।

 

हरिश्चंद्र दुर्गापाल: विकास के योद्धा या बीते कल की पहचान?
पूर्व कैबिनेट मंत्री हरिश्चंद्र दुर्गापाल को विकास की राजनीति का अनुभवी चेहरा माना जाता है। प्रशासनिक समझ, योजनाओं की पकड़ और सत्ता का अनुभव उनकी ताकत है। समर्थक उन्हें “विकास पुरुष” के रूप में पेश करते हैं, लेकिन विरोधी सवाल उठाते हैं—क्या बदले राजनीतिक माहौल में पुराना चेहरा नई उम्मीद जगा पाएगा?

 

 

हरेंद्र सिंह बोरा: संघर्ष की राजनीति का चेहरा
हरेंद्र सिंह बोरा उन नेताओं में शुमार हैं जो सड़क से सदन तक संघर्ष की राजनीति के लिए पहचाने जाते हैं। जनता के हक के लिए दरी बिछाकर धरना हो या कंधे से कंधा मिलाकर आंदोलन—बोरा हर वर्ग के साथ खड़े नजर आते हैं। इससे पहले भी वे लालकुआं से कांग्रेस टिकट पर चुनावी मैदान में उतर चुके हैं।लालकुआं की सियासत में हरेंद्र सिंह बोरा का नाम अब सिर्फ एक दावेदार नहीं, बल्कि एक प्रतीक बन चुका है—लगातार लड़ने का, न हार मानने का और कांग्रेस के प्रति अडिग निष्ठा का।अब देखना यही है कि क्या यह चुनाव उनके लिए सिर्फ एक और कोशिश साबित होगा, या फिर संघर्ष का लंबा इंतजार आखिरकार जीत में बदलेगा।सवाल यही है—क्या इस बार जनता उनके संघर्ष को सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाएगी?

 

 

प्रमोद कॉलोनी: संगठन, समाज और गांव की मजबूत कड़ी
प्रमुख समाजसेवी होने के साथ-साथ कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभा रहे प्रमोद कॉलोनी इस बार प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। ग्रामीण अंचल की छोटी-बड़ी समस्याओं में उनकी सक्रियता, संगठन पर पकड़ और लगातार जनता के बीच मौजूदगी उन्हें मजबूत बनाती है। कांग्रेस के भीतर एक खेमा उन्हें “ग्राउंड लीडर” के तौर पर आगे बढ़ा रहा है।

 

 

बिमला( बिना) जोशी: महिला नेतृत्व का सशक्त दावा

कांग्रेस की वरिष्ठ नेत्री बिमला जोशी ने संगठन के कई महत्वपूर्ण पदों पर जिम्मेदारी निभाई है। जनता के सुख-दुख में शामिल होकर समस्याओं के समाधान के लिए पत्राचार से लेकर आंदोलन तक सक्रिय रहने वाली जोशी महिला मतदाताओं और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच मजबूत पकड़ रखती हैं। सवाल यह है—क्या कांग्रेस इस बार महिला नेतृत्व पर दांव खेलने का साहस करेगी?

 

राजेंद्र सिंह खनवाल: कांग्रेस का जमीनी योद्धा, क्या इस बार बदलेगा सियासी भाग्य?
लालकुआं विधानसभा की राजनीति में अगर किसी नाम ने लगातार संघर्ष, निष्ठा और संगठन के प्रति समर्पण की मिसाल कायम की है, तो वह है राजेंद्र सिंह खनवाल। कांग्रेस के सच्चे सिपाही माने जाने वाले खनवाल न तो सत्ता के सहारे पले-बढ़े, न ही मौके की राजनीति के खिलाड़ी रहे—बल्कि हर दौर में पार्टी का झंडा कंधे पर उठाकर जनता की लड़ाइयों में सबसे आगे खड़े दिखे।

 

मुद्दे वही, जवाब अब तक अधूरे
लालकुआं की जनता आज भी बिंदुखत्ता राजस्व गांव की घोषणा और लालकुआं के मालिकाना हक जैसे बुनियादी मुद्दों के समाधान का इंतजार कर रही है। वर्षों से ये सवाल फाइलों में घूम रहे हैं, लेकिन धरातल पर नतीजा सिफर है। यही मुद्दे इस बार चुनाव की धुरी बन सकते हैं।
कांग्रेस के लिए निर्णायक घड़ी
कांग्रेस जानती है कि सिर्फ बड़ा चेहरा नहीं, बल्कि लोकल स्वीकार्यता और जमीनी संघर्ष ही भाजपा को टक्कर दे सकता है। अगर पार्टी फिर से बाहरी या जनता से कटे चेहरे पर दांव खेलती है, तो इतिहास खुद को दोहरा सकता है।
अब देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस हाईकमान लालकुआं में किसे कमान सौंपता है बहुत हैं लेकिन अभी जो तत्परता के साथ नाम आगे आए हैं जिसमें
विकास का अनुभवी योद्धा, संघर्ष का सिपाही, संगठन का मजबूत स्तंभ या महिला नेतृत्व की नई उम्मीद?
एक बात तो तय  है—गलत फैसला कांग्रेस को फिर चार कदम पीछे धकेल सकता है, और सही चेहरा भाजपा के रथ की रफ्तार पर ब्रेक लगा सकता है।

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