हिमालय प्रहरी

स्व. रोशन लाल छाबड़ा जी ने 65 वर्ष पहले काशीपुर से जगाई थी भक्ति की ज्योत, आज दूसरी पीढ़ी संभाल रही विरासत

खबर शेयर करें -

मां की भेंटों से गूंजता है शहर, एक फोन पर बुक होती है माता की चौकी और जागरण

राजू अनेजा, काशीपुर।काशीपुर की धार्मिक और सामाजिक विरासत में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्हें समय बीतने के साथ भुलाया नहीं जा सकता। स्वर्गीय श्री रोशन लाल छाबड़ा भी ऐसी ही शख्सियत थे, जिन्होंने करीब 65 वर्ष पहले महामाई की भक्ति की जो ज्योत जलाई, वह आज भी निरंतर प्रज्वलित है। उनके द्वारा स्थापित श्री दुर्गा जागरण मंडली आज दूसरी पीढ़ी के माध्यम से मां भगवती का गुणगान और समाजसेवा की परंपरा को आगे बढ़ा रही है।
माता के प्रति उनकी श्रद्धा ऐसी थी कि उन्होंने अपना जीवन ही मां के गुणगान और समाजसेवा को समर्पित कर दिया। जागरण हो अथवा माता की चौकी, उनकी मंडली की भेंटों में ऐसी मिठास और भक्ति का भाव होता था कि श्रद्धालु देर रात तक मां के दरबार में बैठे रहते थे। भव्य श्रृंगार, मनमोहक झांकियां और माता के सजीव स्वरूप के साथ सजने वाला दरबार श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभूति कराता था।
आज समय बदला है, लेकिन परंपरा नहीं बदली। एक फोन पर माता की चौकी और जागरण बुक हो जाता है और तय समय पर मंडली की टीम मां का दरबार सजाने पहुंचती है। दूसरी पीढ़ी उसी श्रद्धा और समर्पण के साथ महामाई की भेंटें प्रस्तुत कर रही है। यह केवल एक धार्मिक मंडली का संचालन नहीं, बल्कि स्व. रोशन लाल छाबड़ा द्वारा छोड़ी गई भक्ति की विरासत को जीवित रखने का प्रयास है।

पाकिस्तान में जन्म, काशीपुर को बनाया कर्मभूमि

स्व. रोशन लाल छाबड़ा पुत्र स्वर्गीय श्री हवेली राम छाबड़ा, का जन्म 10 अगस्त 1939 को पाकिस्तान में हुआ था। बचपन से ही उनका रुझान सामाजिक और धार्मिक कार्यों की ओर था। विभाजन के बाद काशीपुर को उन्होंने अपनी कर्मभूमि बनाया और यहीं से धार्मिक-सामाजिक सेवा की ऐसी यात्रा शुरू की, जिसने उन्हें लोगों के दिलों में विशेष स्थान दिलाया।
करीब 55 वर्षों तक उन्होंने श्री दुर्गा जागरण मंडली के माध्यम से जागरण और माता की चौकियों का आयोजन किया। खास बात यह रही कि इस पूरी सेवा के पीछे उनका उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ नहीं, बल्कि मां की भक्ति के साथ समाज की सेवा करना था।

 

मां के नाम पर जुटी धनराशि को समाज के नाम कर दिया

 

स्व. रोशन लाल छाबड़ा की भक्ति की सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि उन्होंने धर्म को समाजसेवा से जोड़ दिया। जागरण और माता की चौकियों से प्राप्त धनराशि का उपयोग उन्होंने जरूरतमंदों की मदद तथा धार्मिक-सामाजिक कार्यों में किया।
काशीपुर और आसपास के स्कूलों, धार्मिक कार्यों, पंजाबी सभा, श्मशान घाट, गरीब कन्याओं के विवाह तथा जरूरतमंद बच्चों की फीस और स्कूल ड्रेस सहित अनेक कार्यों में सहयोग किया गया।
मंडली से जुड़े सामाजिक एवं धार्मिक कार्यों में अब तक करीब 2 करोड़ 70 लाख रुपये खर्च किए जा चुके हैं। यह रकम स्व. रोशन लाल छाबड़ा की उस सोच का प्रमाण है, जिसमें मां की भक्ति केवल पूजा तक सीमित नहीं थी, बल्कि जरूरतमंदों की सेवा ही सच्ची भक्ति थी।

 

45 साल तक रामलीला में निभाया श्रीराम का किरदार

धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में स्व. रोशन लाल छाबड़ा की गहरी आस्था थी। उन्होंने करीब 45 वर्षों तक श्री रामलीला में भगवान श्रीराम सहित विभिन्न पात्रों का अभिनय किया।
उनके लिए रामलीला केवल अभिनय नहीं थी, बल्कि नई पीढ़ी तक धर्म, संस्कार और मर्यादा का संदेश पहुंचाने का माध्यम थी। मां की भक्ति और प्रभु श्रीराम के आदर्शों के प्रति उनकी इसी आस्था ने उनके व्यक्तित्व को अलग पहचान दी।

 

‘तारा रानी की कथा’ सुनने के लिए सुबह चार बजे तक बैठे रहते थे श्रद्धालु

स्व. रोशन लाल छाबड़ा की सबसे खास पहचान तारा रानी की कथा के भावपूर्ण वाचन से बनी। उनकी आवाज में ऐसा प्रभाव और कथा में ऐसी भावनात्मक गहराई थी कि श्रद्धालु मंत्रमुग्ध होकर घंटों बैठे रहते थे।
बताया जाता है कि जब बाबूजी तारा रानी की कथा सुनाते थे तो लोग सुबह करीब चार बजे तक पूरी एकाग्रता के साथ कथा सुनते रहते थे। कथा के भावुक प्रसंगों का वर्णन करते समय उनका गला रुंध जाता और आंखों में आंसू आ जाते थे। उनकी भावपूर्ण वाणी सुनकर श्रद्धालुओं की आंखें भी नम हो जाती थीं।
लोग आज भी उनकी तारा रानी की कथा को याद करते हुए कहते हैं कि उनकी आवाज में केवल कथा नहीं, मां की भक्ति की अनुभूति होती थी।

 

21 अप्रैल 2018 को दुनिया से विदा हुए, लेकिन भक्ति की ज्योत छोड़ गए

स्व. रोशन लाल छाबड़ा का 21 अप्रैल 2018 को निधन हो गया। मां का गुणगान करने वाले इस भक्त का शरीर भले ही पंचतत्व में विलीन हो गया, लेकिन उनके द्वारा जलाई गई भक्ति की ज्योत आज भी जल रही है।
आज जब श्री दुर्गा जागरण मंडली की ओर से माता की चौकी या जागरण में भेंटें गूंजती हैं, मां का दरबार सजता है और श्रद्धालु जय माता दी के जयकारे लगाते हैं, तो स्व. रोशन लाल छाबड़ा की वर्षों की साधना सहज ही याद आ जाती है।
65 वर्ष पहले उन्होंने जो शुरुआत की थी, वह आज दूसरी पीढ़ी के हाथों आगे बढ़ रही है। मां की भक्ति, समाजसेवा और धार्मिक संस्कृति के प्रति समर्पण ही स्व. रोशन लाल छाबड़ा की सबसे बड़ी पहचान और उनकी अमूल्य विरासत है।

Exit mobile version