चौखुटिया (अल्मोड़ा) की गेवाड़ घाटी से प्रकृति के बदलते मिजाज की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो न केवल हैरान करने वाली है, बल्कि जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के गंभीर संकेतों की ओर इशारा कर रही है। जिन फलों को जून-जुलाई की चिलचिलाती धूप और मानसूनी बारिश में पकना चाहिए था, वे जनवरी की हाड़ कंपाने वाली ठंड में पेड़ों पर लदे हुए हैं।
यहाँ इस प्राकृतिक बदलाव और इसके पीछे के वैज्ञानिक कारणों का विवरण दिया गया है:
अल्मोड़ा: चौखुटिया ब्लॉक की ग्राम पंचायत चुलेरासीम (मालूधार) में किसान और ग्रामीण उस वक्त दंग रह गए जब उन्होंने अपने बगीचों में अखरोट और नाशपाती के पेड़ों को फलों से लदा पाया। आमतौर पर पतझड़ के इस मौसम में टहनियां खाली होती हैं, लेकिन यहां नजारा बिल्कुल उलट है।
🧬 वानस्पतिक परिवर्तन के मुख्य उदाहरण
| फल का नाम | सामान्य समय (पकने का) | वर्तमान स्थिति (जनवरी 2026) |
| अखरोट | मई – जून | पूरी तरह तैयार और परिपक्व। |
| नाशपाती | जून – जुलाई | पेड़ों पर फल लग चुके हैं। |
| अन्य पेड़ | मार्च – अप्रैल (बौर आना) | जनवरी में ही बौर और छोटे फल आना शुरू। |
🌡️ क्यों बदल रहा है प्रकृति का चक्र?
विशेषज्ञों और उद्यान विभाग के अनुसार, इस असाधारण बदलाव के पीछे मुख्य रूप से तीन कारण हैं:
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तापमान में असंतुलन: इस साल पूस-माघ के महीने में भी घाटी क्षेत्रों में दिन के समय असामान्य गर्मी महसूस की गई। पौधों ने इस गर्मी को ‘वसंत’ समझ लिया और समय से पहले प्रजनन चक्र (Flowering & Fruiting) शुरू कर दिया।
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वर्षा का अभाव: सर्दियों में बारिश न होने के कारण ‘ड्राय स्पेल’ (शुष्क मौसम) लंबा खिंच गया, जिससे पेड़ों की आंतरिक जैविक घड़ी (Biological Clock) गड़बड़ा गई।
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ग्लोबल वार्मिंग: हिमालयी क्षेत्रों में मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है, जिसके कारण वनस्पतियों के व्यवहार में स्थायी परिवर्तन देखे जा रहे हैं।
🗣️ स्थानीय लोगों और विशेषज्ञों की राय
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पान सिंह नेगी (काश्तकार): “60 साल की उम्र में पहली बार सर्दियों में अखरोट के पेड़ को फलों से लदा देखा है। यह हैरत की बात है कि बिना पत्तियों के टहनियों पर फल तैयार हैं।”
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योगेश दत्त थपलियाल (उद्यान विभाग): “मौसम गड़बड़ाने से ऐसे परिवर्तन होते हैं। गर्मी के कारण पेड़ों पर समय से पहले बौर आ गया है, जो आमतौर पर फरवरी-मार्च में आता है।”
⚠️ क्या होंगे इसके परिणाम?
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फसल की गुणवत्ता: समय से पहले लगने वाले फलों के स्वाद, आकार और पोषक तत्वों में कमी आ सकती है।
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कीटों का हमला: मौसम के इस बदलाव से उन कीटों और बीमारियों का प्रकोप बढ़ सकता है जो आमतौर पर गर्मियों में सक्रिय होते हैं।
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आर्थिक नुकसान: यदि यह बदलाव स्थायी होता है, तो भविष्य में पारंपरिक खेती और बागवानी के संकट में पड़ने की आशंका है।
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