
राजू अनेजा, देहरादून।उत्तराखंड की राजनीति में कभी-कभी छोटे से प्रतीक बड़े सियासी संदेश दे जाते हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को अपने खेतों का चावल भेंट करना भी ऐसा ही एक सधा हुआ प्रतीक बनकर उभरा है। यह सिर्फ औपचारिक भेंट नहीं, बल्कि राजनीति की थाली में परोसा गया एक ऐसा संदेश है, जिसकी खुशबू सत्ता और विपक्ष—दोनों खेमों में फैलती दिख रही है।
राजनीति के “पुराने चावल” को सम्मान देकर “नए चावल” ने यह जता दिया कि सियासत का असली स्वाद अनुभव के बिना अधूरा रहता है। चुनाव भले अभी दूर हों, लेकिन चावल के ये दाने साफ बता रहे हैं कि 2027 की रसोई अभी से सजने लगी है। संकेत साफ हैं—खेल की शुरुआत हो चुकी है और चालें पूरी नाप-तौल के साथ चली जा रही हैं।
भाजपा के भीतर गुटबाजी की आँच भले ही धीमी आंच पर सुलग रही हो, लेकिन मुख्यमंत्री धामी ने अपने इस कदम से यह स्पष्ट कर दिया कि वे टकराव की नहीं, तड़के वाली राजनीति के खिलाड़ी हैं। पुराने चावल को उबालने के बजाय उसे सम्मान से परोसना, उनकी संतुलन साधने वाली रणनीति का ही हिस्सा माना जा रहा है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के आवास पर पहुंचकर उनका कुशलक्षेम जाना और इस दौरान उन्हें अपने खेतों में उपजे चावल भेंट किए। यह मुलाकात सामान्य राजनीतिक शिष्टाचार से कहीं आगे मानी जा रही है, क्योंकि यह ऐसे वक्त हुई है जब 2027 का विधानसभा चुनाव धीरे-धीरे सियासी एजेंडे के केंद्र में आता जा रहा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मुख्यमंत्री धामी खुद को “सबको साथ लेकर चलने वाले नेता” के रूप में स्थापित करने में जुटे हैं। पार्टी के भीतर चल रही खींचतान और गुटबाजी की चर्चाओं के बीच यह मुलाकात साफ संकेत देती है कि धामी टकराव नहीं, बल्कि संतुलन, संवाद और सौम्य सियासत के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहते हैं।
प्रदेश की राजनीति के “पुराने चावल” कहे जाने वाले हरीश रावत से इस तरह की आत्मीय भेंट को विपक्ष के प्रति सम्मान और राजनीतिक परिपक्वता के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है। चावल का यह उपहार जहां सादगी, किसान संस्कृति और मिट्टी से जुड़ाव को दर्शाता है, वहीं इसके पीछे छिपा संदेश भी उतना ही साफ है—अनुभव का सम्मान और भविष्य की तैयारी।
मुख्यमंत्री धामी ने इस मुलाकात की जानकारी सोशल मीडिया पर साझा की, जिसके बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया। समर्थक इसे मुख्यमंत्री की सहजता और संस्कार बता रहे हैं, जबकि राजनीतिक विश्लेषक इसे चुनाव से पहले की “सॉफ्ट पॉलिटिक्स” का एक अहम दांव मान रहे हैं।
चुनावी रण भले अभी दूर हो, लेकिन संकेत स्पष्ट हैं। भाजपा की हैट्रिक के लक्ष्य को लेकर मुख्यमंत्री धामी पूरी ऊर्जा के साथ मैदान सजाने में जुटे हैं और हर वर्ग, हर सियासी धड़े को साधने की रणनीति पर लगातार काम कर रहे हैं।
अब सवाल यही है—क्या यह मुलाकात महज सम्मान और शिष्टाचार तक सीमित थी, या फिर 2027 की राजनीति में चावल के दानों से साधा गया एक सधा हुआ चुनावी दांव?
राजनीति में जवाब वक्त देता है, लेकिन फिलहाल इतना तय है कि यह “चावल की राजनीति” उत्तराखंड की सियासत में लंबे समय तक चर्चा का स्वाद बनाए रखने वाली है।
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