नीताल: उत्तराखंड उच्च न्यायालय (High Court) के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस आलोक कुमार वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। पिछले करीब एक महीने से कानूनी गलियारों और मीडिया में उनके इस्तीफे को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं चल रही थीं, लेकिन इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पा रही थी। अब प्रेस इनफॉरमेशन ब्यूरो (PIB) द्वारा जारी आधिकारिक विज्ञप्ति के बाद इस खबर पर पूरी तरह मुहर लग गई है। पीआईबी की विज्ञप्ति के अनुसार, जस्टिस आलोक कुमार वर्मा का यह इस्तीफा 30 अप्रैल 2026 से प्रभावी माना जाएगा। सूत्रों के मुताबिक, उन्होंने खराब स्वास्थ्य और कुछ अन्य निजी कारणों के चलते मार्च के महीने में ही अपना त्यागपत्र केंदीय विधि मंत्रालय को भेज दिया था। विशेष बात यह है कि जस्टिस वर्मा इसी वर्ष अगस्त के पहले सप्ताह में अपनी सेवा से सेवानिवृत्त (Retire) होने वाले थे, लेकिन उन्होंने कुछ माह पूर्व ही पद छोड़ने का निर्णय लिया।
1987 में यूपी न्यायिक सेवा से शुरू हुआ था सफर, उत्तराखंड गठन के बाद देवभूमि को चुना
जस्टिस आलोक कुमार वर्मा का न्यायिक सफर बेहद शानदार और लंबा रहा है:
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शुरुआती जीवन और शिक्षा: 16 अगस्त 1964 को उत्तर प्रदेश के सांस्कृतिक शहर वाराणसी (बनारस) में जन्मे न्यायमूर्ति वर्मा ने वर्ष 1985 में कानून (विधि) की डिग्री हासिल की थी।
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यूपी में सेवाएं: इसके बाद वर्ष 1987 में उनका चयन उत्तर प्रदेश की प्रतिष्ठित न्यायिक सेवा में हुआ। उन्होंने उत्तर प्रदेश के कई जिलों में न्यायिक मजिस्ट्रेट और न्यायाधीश के रूप में अपनी सेवाएं दीं।
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उत्तराखंड का चयन: 9 नवंबर 2000 को जब उत्तर प्रदेश से अलग होकर नए उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ, तो उन्होंने देवभूमि की न्यायिक सेवा को प्राथमिकता दी और यहीं रच-बस गए।
जिला जज से लेकर सरकार के कानूनी सलाहकार और हाईकोर्ट जज तक का सफर
उत्तराखंड आने के बाद जस्टिस आलोक कुमार वर्मा ने राज्य की न्याय व्यवस्था को मजबूत करने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे राज्य के टिहरी गढ़वाल, चमोली, ऊधमसिंह नगर और देहरादून जैसे बड़े और संवेदनशील जनपदों में जिला एवं सत्र न्यायाधीश (District Judge) के रूप में तैनात रहे। अपनी प्रशासनिक और विधिक कार्यकुशलता के चलते उन्होंने उत्तराखंड सरकार में प्रधान सचिव (विधि)-सह-कानूनी सलाहकार के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं और सरकार को कई पेचीदा मामलों में कानूनी राह दिखाई।
उनकी उत्कृष्ट न्याय प्रणाली को देखते हुए मई 2019 में उन्हें उत्तराखंड हाईकोर्ट के अतिरिक्त न्यायाधीश (Additional Judge) के रूप में प्रोन्नत किया गया, जिसके बाद उन्होंने 27 मई 2019 को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में अपने पद और गोपनीयता की शपथ ली थी। उनके अचानक इस तरह इस्तीफा देने से उत्तराखंड के विधिक और न्यायिक हलकों में मायूसी है, वहीं तमाम वरिष्ठ वकीलों और जजों ने उनके बेहतर स्वास्थ्य की कामना की है।
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