उत्तराखंड की मिड-डे मील योजना की रीढ़ मानी जाने वाली भोजनमाताओं ने अपने हक और सम्मान के लिए हुंकार भर दी है। सोमवार से शुरू हुई इस प्रदेशव्यापी हड़ताल ने न केवल शिक्षा विभाग, बल्कि शासन-प्रशासन के सामने भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ₹3,000 के अल्प मानदेय पर काम कर रही इन महिलाओं का दर्द अब सड़कों पर ज्ञापन के रूप में दिखाई दे रहा है।
यहाँ भोजनमाताओं के आंदोलन, उनकी समस्याओं और मांगों का विस्तृत विवरण दिया गया है:
मुख्य अपडेट: प्रदेश भर की भोजनमाताओं ने अपनी मांगों को लेकर मुख्य शिक्षा अधिकारी कार्यालयों पर प्रदर्शन किया और मुख्यमंत्री को संबोधित ज्ञापन सौंपा।
📉 प्रमुख समस्याएं: शोषण और आर्थिक तंगी
भोजनमाताओं ने अपनी कार्यस्थिति को लेकर कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं:
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मानदेय का संकट: शासन ने ₹5,000 की घोषणा की है, लेकिन धरातल पर केवल ₹3,000 ही मिल रहे हैं। वह भी कई महीनों की देरी से मिलता है।
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कार्य का दायरा: उनसे केवल खाना पकवाना ही नहीं, बल्कि सफाई, चौकीदारी और मैदान की देखरेख जैसे अतिरिक्त कार्य भी कराए जा रहे हैं, जिसका कोई अतिरिक्त भुगतान नहीं होता।
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मानसिक दबाव: विरोध करने पर नौकरी से हटाने की धमकी और विद्यालयों में अपमानजनक व्यवहार की शिकायतें आम हैं।
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असुरक्षित रसोई: कई स्कूलों में उचित वेंटिलेशन, पानी और सुरक्षित गैस कनेक्शन जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है।
📋 प्रमुख मांगें और सुझाव
भोजनमाताओं ने सरकार के सामने अपनी 5 सूत्रीय मांगें रखी हैं:
| मांग | उद्देश्य |
| नियमितीकरण व मानदेय | चतुर्थ कर्मचारी का दर्जा देकर न्यूनतम ₹18,000 मानदेय दिया जाए। |
| सामाजिक सुरक्षा | भविष्य निधि (PF), बीमा और सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन की व्यवस्था हो। |
| तय कार्य सीमा | केवल भोजन पकाने की जिम्मेदारी हो; सफाई व अन्य कार्यों से मुक्ति मिले। |
| बुनियादी सुविधाएं | हर स्कूल में सुरक्षित रसोई, गैस और पानी का स्थायी प्रबंध हो। |
| नौकरी की सुरक्षा | बच्चों की संख्या कम होने पर भोजनमाताओं को हटाने का नियम रद्द किया जाए। |
💬 दर्द जो ज्ञापन में झलका
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लतिका मंडल व कनक लता: “₹3,000 में महंगाई के दौर में परिवार पालना और बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाना असंभव है। हम कर्ज में डूब रहे हैं।”
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बबीता व कमलेश: “हमसे सफाई कराई जाती है, लेकिन सम्मान नहीं मिलता। रसोई में मूलभूत सुविधाएं तक नहीं हैं।”
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नीलम व पूनम: “वर्षों की सेवा के बाद भी न भविष्य सुरक्षित है और न ही बीमा की सुविधा। हम खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं।”
👮 प्रशासन का रुख
केएस रावत (मुख्य शिक्षा अधिकारी): > “भोजनमाताओं का ज्ञापन प्राप्त हुआ है जिसे शासन को भेजा जा रहा है। विद्यालय प्रबंधन पर शोषण और अपमानजनक व्यवहार के जो आरोप लगे हैं, उनकी गहन जांच कराई जाएगी। दोषी पाए जाने पर विभागीय कार्रवाई की जाएगी।”
💡 निष्कर्ष
भोजनमाताओं की यह हड़ताल मिड-डे मील योजना की गुणवत्ता पर भी असर डाल सकती है। हालांकि, हड़ताल पर जाने से पहले उन्होंने बच्चों के लिए भोजन तैयार किया, जो उनकी कर्तव्यनिष्ठा को दर्शाता है। अब गेंद सरकार के पाले में है कि वह इन ‘पोषण दूतों’ को सम्मानजनक जीवन देती है या उनकी मांगों को अनसुना करती है।
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