
उत्तराखंड में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। महज कुछ ही महीनों में राज्य चुनावी समर में उतरने जा रहा है और सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी रणनीतिक किलेबंदी में जुट गए हैं। हालांकि, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। राज्य की कुल 70 में से करीब 30 फीसदी (लगभग 24) सीटों पर चुनावी गणित पार्टी के लिए बेहद उलझा हुआ नजर आ रहा है। इन सीटों पर या तो पार्टी के पास कोई मजबूत और बड़ा चेहरा नहीं बचा है, या फिर पिछले चुनावों में मिली बड़ी हार के कारण भारी मनोवैज्ञानिक दबाव है।
बड़ी हार का इतिहास और 24 सीटों का गणित
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन काफी निराशाजनक रहा था और पार्टी लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी करने से चूक गई थी। पुराने चुनावी आंकड़ों के तुलनात्मक विश्लेषण के अनुसार:
-
वर्ष 2012: कांग्रेस ने 32 और बीजेपी ने 31 सीटें जीती थीं। कांग्रेस ने बसपा, यूकेडी और निर्दलीयों के सहयोग से सरकार बनाई थी।
-
वर्ष 2017: मोदी लहर के चलते बीजेपी ने 57 सीटों पर प्रचंड जीत हासिल की, जबकि कांग्रेस सिमटकर महज 11 सीटों पर रह गई। उस चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी 23 सीटों पर 10,000 से अधिक वोटों के अंतर से हारे थे।
-
वर्ष 2022: बीजेपी ने 47 सीटें जीतकर दोबारा सरकार बनाई, जबकि कांग्रेस को 19 सीटें मिलीं। इस चुनाव में भी 19 सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवार 10,000 से अधिक वोटों के भारी अंतर से परास्त हुए थे।
देहरादून और अन्य जिलों में चिंताजनक स्थिति
जिलेवार आंकड़ों को देखें तो स्थिति और भी गंभीर दिखती है। अकेले देहरादून जिले की 10 में से 7 विधानसभा सीटों—डोईवाला, मसूरी, देहरादून कैंट, रायपुर, धर्मपुर, ऋषिकेश और राजपुर—पर कांग्रेस प्रत्याशी भारी अंतर से हारे थे। इसके अलावा हरिद्वार की रानीपुर और हरिद्वार सीट के साथ-साथ चौबट्टाखाल, यमकेश्वर, घनसाली, बागेश्वर, गंगोलीहाट, लालकुआं, कालाढूंगी, रुद्रपुर, सितारगंज और काशीपुर जैसी प्रमुख सीटों पर भी पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा था।
बड़े नेताओं के पलायन से खाली हुए गढ़
कांग्रेस के सामने दूसरी बड़ी चुनौती प्रत्याशियों की भारी कमी है। कई दिग्गज और जनाधार वाले नेता पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो चुके हैं, जिससे कई क्षेत्रों में पार्टी पूरी तरह नेतृत्वविहीन हो गई है:
-
देहरादून: डोईवाला सीट से वरिष्ठ नेता हीरा सिंह बिष्ट के निधन के बाद पार्टी के पास विकल्प नहीं दिख रहा, वहीं पूर्व मंत्री दिनेश अग्रवाल के बीजेपी में जाने से धर्मपुर सीट पर भी बड़ा चेहरा गायब है।
-
अन्य क्षेत्र: जोत सिंह बिष्ट (धनौल्टी), राजेंद्र भंडारी (बदरीनाथ), धन सिंह नेगी (टिहरी), शैलेंद्र रावत (यमकेश्वर), केशर सिंह नेगी (चौबट्टाखाल), यशपाल राणा (रुड़की) और दान सिंह भंडारी (भीमताल) जैसे कई स्थापित चेहरे पार्टी का साथ छोड़ चुके हैं।
36 के जादुई आंकड़े की राह और उम्मीद की किरण
कुल 70 सीटों वाले राज्य में सरकार बनाने के लिए 36 सीटों का जादुई आंकड़ा जरूरी है। जब पार्टी पहले से ही 24 सीटों पर खुद को कमजोर मान रही है, ऐसे में बहुमत हासिल करना किसी चमत्कार से कम नहीं होगा। यह स्थिति बीजेपी को बढ़त प्रदान करती है। हालांकि, सियासत के जानकारों का मानना है कि 10 साल से सत्ता में मौजूद बीजेपी सरकार के खिलाफ बनने वाली ‘एंटी-इंकंबेंसी’ (सत्ता विरोधी लहर) कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा हथियार साबित हो सकती है। यदि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व आपसी मतभेद भुलाकर एकजुटता के साथ मैदान में उतरता है, तो वह इस कठिन राजनीतिक घेराबंदी से बाहर निकलने में सफल हो सकती है।
अपने मोबाइल पर ताज़ा अपडेट पाने के लिए -
👉 हमारे व्हाट्सएप ग्रुप को ज्वाइन करें