
हल्द्वानी: उत्तराखंड के पहाड़ों से लेकर मैदानों तक फैली बदहाल और बेबस स्वास्थ्य सेवाओं की भेंट एक बार फिर एक मासूम नवजात चढ़ गया। कुमाऊं के सबसे बड़े सरकारी चिकित्सालय डॉ. सुशीला तिवारी अस्पताल (STH) से लेकर देश के प्रतिष्ठित संस्थान एम्स (AIIMS) ऋषिकेश तक इलाज के लिए दर-दर भटकने के बाद अंततः एक नवजात शिशु ने दम तोड़ दिया। विडंबना यह रही कि दोनों ही बड़े सरकारी अस्पतालों ने रेफर होने के बावजूद इस नन्हीं जान को वेंटिलेटर या बेड न होने का हवाला देकर भर्ती नहीं किया। अंत में शुक्रवार को नैनीताल रोड स्थित एक निजी अस्पताल में उपचार के दौरान बच्चे की मौत हो गई।
न्यूरोसर्जन के अवकाश पर होने से एसटीएच ने किया एम्स रेफर
पारिवारिक और अस्पताल सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, रामपुर रोड निवासी एक महिला ने पिछले शनिवार को सुशीला तिवारी अस्पताल में सामान्य प्रसव के माध्यम से एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया था।
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पीठ पर फोड़ा: जन्म के तुरंत बाद नवजात की पीठ पर एक बड़ा फोड़ा देखा गया, जिसके कारण उसे फौरन अस्पताल के एसएनसीयू (SNCU) वॉर्ड में भर्ती किया गया।
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इलाज में लाचारी: सोमवार शाम को बच्चे की स्थिति अत्यधिक नाजुक होने लगी, जिस पर डॉक्टरों ने उसे तत्काल एम्स ऋषिकेश के लिए रेफर कर दिया। एसटीएच से रेफर किए जाने का मुख्य कारण यह था कि पूरे अस्पताल में केवल एक ही न्यूरोसर्जन तैनात हैं, और वे उस दिन उपलब्ध नहीं थे। बच्चे की गंभीर सर्जरी के लिए अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टर न होने के चलते परिजनों को ऋषिकेश का रास्ता दिखा दिया गया।
एम्स ऋषिकेश ने भी किया मना; एम्बुलेंस में देहरादून से हल्द्वानी दौड़ते रहे परिजन
मासूम के परिजनों का विधिक आरोप है कि जब वे जीवन और मौत से जूझ रहे नवजात को लेकर एम्स ऋषिकेश पहुंचे, तो वहां के प्रशासन और डॉक्टरों ने भी बच्चे को भर्ती करने से साफ मना कर दिया।
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दर-दर भटके परिजन: एम्स से दुत्कारे जाने के बाद बेबस परिजन सोमवार रात को ही बच्चे को एम्बुलेंस में वेंटिलेटर सपोर्ट पर लेकर देहरादून की ओर दौड़े और वहां एक निजी अस्पताल में दाखिल कराया।
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नहीं मिला सही इलाज: देहरादून के निजी अस्पताल में भी भारी खर्च के बावजूद सही इलाज और डॉक्टरों का सहयोग न मिलने के कारण हताश होकर परिजन मंगलवार को बच्चे को वापस हल्द्वानी अपने घर ले आए।
इसके बाद बच्चे की बिगड़ती सांसों को थामने के लिए उसे आनन-फानन में हल्द्वानी के ही नैनीताल रोड स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां जिंदगी और मौत की जंग लड़ते हुए शुक्रवार को मासूम ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया।
सरकारी सिस्टम की हकीकत: एकमात्र न्यूरोसर्जन 5 दिन की छुट्टी पर थे
यह दर्दनाक वाकया राज्य के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी और लचर रेफरल पॉलिसी की पोल खोलता है। इस गंभीर विधिक लापरवाही और मामले की सफाई में डॉ. सुशीला तिवारी अस्पताल (STH) के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. अरुण जोशी ने आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा:
“अस्पताल के एकमात्र न्यूरोसर्जन करीब पांच दिन के विधिक अवकाश पर चल रहे थे, जो कि अब वापस ड्यूटी पर लौट आए हैं। सुशीला तिवारी अस्पताल से सभी अति गंभीर मरीजों को उच्च विधिक व चिकित्सा उपचार के लिए एम्स ऋषिकेश ही रेफर किया जाता है। यदि एम्स जैसे बड़े संस्थान में भी मरीज को समय पर इलाज और बेड नहीं मिल पा रहा है, तो इस विषय पर हम यहाँ से कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हैं।”
— डा. अरुण जोशी, चिकित्सा अधीक्षक, एसटीएच
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