
साहित्यिक कोना: अल्मोड़ा के द्वाराहाट से दिल्ली जा रही एक ट्रेन की बोगी में जब दो मुसाफिर मिले, तो एक मुसाफिर (भोई साहब) के भीतर दबा यादों और आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। जीवन के सफर में भाई-बहन के पवित्र रिश्ते में मिली असीम आत्मीयता और फिर उसके बाद मिले असहनीय दर्द को बयां करती, कवि गोकुलानंद जोशी ‘उत्तराखण्डी’ की यह मर्मस्पर्शी कविता:
कविता: अधूरी आस का सफर
सर्दियों के मौसम में हल्द्वानी से दिल्ली जाने वाली ट्रेन की बोगी में दो अजनबी साथ बैठे। एक जो अपनी कंपनी के काम से दिल्ली जा रहे थे, और दूसरे अल्मोड़ा के द्वाराहाट से आए ‘भोई साहब’। ट्रेन जैसे ही हल्द्वानी से आगे बढ़ी, भोई साहब के चेहरे पर छाई मायूसी साफ दिखने लगी। पूछने पर उनकी आँखें भर आईं और उन्होंने बताया कि वह अपनी उस बहन को याद कर रहे हैं, जिसे उन्होंने सगी बहन से भी बढ़कर माना था। भोई साहब ने अपनी जिंदगी के पन्नों को पलटते हुए इस सफर की शुरुआत अपने गांव के सरकारी स्कूल से की, जहाँ कक्षा 9 में उनकी मुलाकात नेहा नाम की लड़की से हुई थी। दोनों एक-दूसरे को भाई-बहन मानते थे और साथ में ही 3 किलोमीटर दूर गणित के ट्यूशन जाते थे। हाईस्कूल तक उनका यह रिश्ता इतना गहरा था कि स्कूल के बाकी बच्चे उन्हें नेहा का ‘अंगरक्षक’ कहकर चिढ़ाते थे। इस बात पर हुए विवाद के कारण उन्होंने एक बार शिक्षक से मार भी खाई, लेकिन नेहा के प्रति उनका निश्छल लगाव ऐसा था कि वह उसे कभी किसी मुसीबत में नहीं देख सकते थे। इस लगाव के कारण उन्हें अक्सर घर से डांट मिलती थी और वह अकेले में रोते थे। हाईस्कूल के बाद नेहा ने विज्ञान और उन्होंने वाणिज्य विषय चुना, जिससे रास्ते अलग हो गए। वक्त बदला और नेहा के जीवन में कोई और जीवनसाथी आ गया, जिससे भोई साहब खुश थे। आज भी कभी-कभार व्हाट्सएप पर उनकी बात हो जाती है।
कहानी सुनते-सुनते मुरादाबाद स्टेशन आ गया, जहाँ गर्मागर्म चाय की चुस्कियों के साथ भोई साहब ने अपने जीवन का दूसरा और अधिक दर्दनाक अध्याय खोला। कॉलेज के द्वितीय वर्ष में उनकी मुलाकात दूसरे विभाग की एक प्रथम वर्ष की छात्रा से हुई। शाम के समय आए उसके पहले संदेश से शुरू हुआ सफर धीरे-धीरे भाई-बहन के एक ऐसे गहरे रिश्ते में बदल गया, जिसने भोई साहब के जीवन में पहली बहन की कमी को पूरा कर दिया। यह लगाव पहली बहन से भी कहीं ज्यादा गहरा था। वे दोनों अक्सर लड़ते, रूठते और एक-दूसरे को कसम देकर मनाते थे। जब दोस्तों ने ताना मारा कि वह कोई सगी बहन नहीं है, तो भोई साहब का जवाब था कि वह उससे भी बढ़कर है। हालांकि, इंस्टाग्राम स्टोरी पर फोटो लगाने के बाद हुई कुछ बहसों के कारण उन्होंने अपनी इस बहन के कहने पर कुछ लोगों को ब्लॉक भी कर दिया।
धीरे-धीरे इस रिश्ते में दूरियां आने लगीं। वह लड़की अब भोई साहब को पहले की तरह वक्त नहीं देती थी और बातें छिपाने लगी थी। जिस दिन उनसे लड़ाई होती, भोई साहब रात-रात भर रोते और खाना तक नहीं खाते थे। उन्हें अहसास हो गया था कि वह लड़की न तो उनसे दूर जाना चाहती है और न ही पहले की तरह बात करना चाहती है, उसने भोई साहब को महज एक ‘विकल्प’ बनाकर रख दिया था—जैसे सांसें तो चलती रहें, पर जीवन न हो। इस मानसिक तनाव और गुस्से में भोई साहब ने कई बार खुद को शारीरिक नुकसान भी पहुंचाया, यहाँ तक कि उनकी उंगली भी कट गई। देहरादून से लौटते वक्त कुछ कड़वी सच्चाइयों का पता चलने पर उन्होंने लड़की को डांटा भी। उनके मन ने कहा कि समाज में उनका एक प्रतिष्ठित नाम है और उन्हें खुद को इस तरह बर्बाद नहीं करना चाहिए। लड़की ने माफी का संदेश भेजकर आगे से सब कुछ बताने का वादा तो किया, लेकिन अब बातचीत केवल आधे घंटे तक सिमट चुकी थी। यह आठ महीने का सफर दिल्ली स्टेशन पर आकर रुक गया। भोई साहब उदास मन से ट्रेन से उतरे और स्टेशन पर ही बैठकर रोने लगे। जब लेखक ने पूछा कि अब क्या करोगे, तो उनका जवाब था—”यहीं बैठकर उसके मैसेज का इंतजार करूंगा, आगे का कुछ सोचा नहीं है।” लेखक मन ही मन सोचने लगा कि दो लड़कियों को उन्होंने अपनी बहन माना, दोनों की कहानी एक जैसी रही, बस दूसरी वाली से लगाव और दर्द कहीं ज्यादा गहरा था।
### कहानी से सीख और समीक्षा
यह कहानी मानवीय संवेदनाओं, अत्यधिक भावुकता और रिश्तों में व्यावहारिक संतुलन की कमी को दर्शाती है। इस सत्य घटना से सबसे बड़ी सीख यह मिलती है कि किसी भी रिश्ते में—चाहे वह भाई-बहन का हो या कोई अन्य—अत्यधिक निर्भरता और अंधा लगाव अंततः आत्म-विनाश का कारण बनता है। भोई साहब का स्वभाव अत्यंत भावुक था, जिसके कारण उन्होंने सामने वाले को अपने जीवन का केंद्र बिंदु बना लिया। जब रिश्तों में सामने वाले व्यक्ति की प्राथमिकताएं बदलने लगती हैं, तो उस बदलाव को स्वीकार करना जरूरी होता है। अपनी गरिमा, मानसिक शांति और सामाजिक प्रतिष्ठा को ताक पर रखकर किसी ऐसे व्यक्ति के पीछे भागना जो आपको केवल एक विकल्प समझता हो, बुद्धिमानी नहीं है। व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि आत्मसम्मान से बड़ा कोई रिश्ता नहीं होता और किसी अन्य के व्यवहार के कारण खुद को शारीरिक या मानसिक नुकसान पहुंचाना पूरी तरह अनुचित है।
दूसरे दृष्टिकोण से यह कहानी हमें सिखाती है कि संवाद और अपेक्षाओं की एक स्पष्ट सीमा होनी चाहिए। जब हम किसी रिश्ते को सगे संबंधों से भी ऊपर का दर्जा देते हैं, तो हमारी अपेक्षाएं भी अवास्तविक रूप से बढ़ जाती हैं। इस कहानी में दोनों बहनों के साथ भोई साहब का अनुभव लगभग एक जैसा रहा, जो यह संकेत देता है कि समस्या केवल सामने वाले के व्यवहार में नहीं, बल्कि भोई साहब के अत्यधिक संवेदनशील और अधिकारवादी स्वभाव में भी थी। जीवन में समय के साथ बदलाव अनिवार्य है; लोग आगे बढ़ते हैं और उनके जीवन में नए रिश्ते आते हैं। ऐसे में पुराने रिश्तों के कम होते वक्त को सहजता से स्वीकार न कर पाना और दिल्ली स्टेशन पर बैठकर एक अनिश्चित संदेश का इंतजार करना केवल मानसिक पीड़ा को बढ़ाता है। समझदारी इसी में है कि अतीत की कड़वाहट को भुलाकर, खुद को संभालते हुए जीवन के यथार्थ को स्वीकार किया जाए और भविष्य की ओर कदम बढ़ाया जाए।
कहानी की सीख और समीक्षा
यह काव्यमयी कहानी मानवीय संवेदनाओं, अत्यधिक भावुकता और रिश्तों में व्यावहारिक संतुलन की कमी को दर्शाती है। जीवन का यह यथार्थ हमें सिखाता है कि किसी भी रिश्ते में अत्यधिक निर्भरता और अंधा लगाव अंततः आत्म-विनाश का कारण बनता है। समय के साथ लोगों की प्राथमिकताएं बदलती हैं, और इस बदलाव को सहजता से स्वीकार करना ही बुद्धिमानी है। अपनी गरिमा, मानसिक शांति और सामाजिक प्रतिष्ठा को ताक पर रखकर किसी ऐसे व्यक्ति के पीछे भागना जो आपको केवल एक ‘विकल्प’ समझता हो, उचित नहीं है। आत्मसम्मान से बड़ा कोई रिश्ता नहीं होता।
लेखक परिचय:
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लेखक एवं कवि: गोकुलानंद जोशी ‘उत्तराखण्डी’
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वर्तमान पता: पश्चिमी राजीव नगर, घोड़ानाला, बिंदुखत्ता, जनपद नैनीताल, उत्तराखण्ड।
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मूल निवास: ग्राम करासमाफी, पोस्ट ऑफिस जनौटी पालड़ी, काफलीगैर, जनपद बागेश्वर, उत्तराखण्ड। (गोकुलानंद जोशी युवा लेखक एवं कवि हैं। उनकी अनेक कविताएँ एवं लेख विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं तथा साहित्यिक मंचों पर प्रकाशित हो चुके हैं। सामाजिक सरोकार, मानवीय रिश्ते और उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति उनके लेखन के प्रमुख विषय हैं।)
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