उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: वनाधिकार दावों के निपटारे तक वन गुर्जरों की बेदखली पर रोक
नैनीताल: न्यायमूर्ति आलोक माहरा की एकलपीठ ने वन गुर्जरों के हितों की रक्षा करते हुए राज्य सरकार और वन विभाग को सख्त निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा है कि जब तक समुदाय द्वारा प्रस्तुत ‘वनाधिकार दावों’ का अंतिम निस्तारण नहीं हो जाता, तब तक उन्हें उनकी पारंपरिक भूमि से नहीं हटाया जाएगा।
📜 मुख्य कानूनी बिंदु और आदेश
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वनाधिकार अधिनियम 2006: याचिकाकर्ताओं ने ‘अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वनाधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006’ का कड़ाई से पालन करने की मांग की थी।
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अधिकारों की रक्षा: कोर्ट ने आदेश दिया कि वन गुर्जरों के कब्जे वाली भूमि और उनकी कृषि गतिविधियों में कोई हस्तक्षेप न किया जाए।
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एक महत्वपूर्ण शर्त: न्यायमूर्ति माहरा ने यह भी स्पष्ट किया कि इस भूमि का उपयोग केवल कृषि कार्यों के लिए ही होगा। किसी भी प्रकार की व्यावसायिक या गैर-कृषि गतिविधि की अनुमति नहीं दी जाएगी।
🔍 याचिकाकर्ताओं के तर्क
मो. अली और अन्य याचिकाकर्ताओं ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से कोर्ट को बताया:
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परंपरा: वन गुर्जर पीढ़ियों से पशुपालन और खेती पर निर्भर हैं।
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नोटिस का अभाव: वन अधिकारी बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के उन्हें हटाने की धमकी दे रहे थे।
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प्रशासनिक ढिलाई: तराई पूर्वी वन प्रभाग से संबंधित दावे मई और जून 2025 में जिलाधिकारियों को सौंपे गए थे, लेकिन महीनों बाद भी उन पर कोई निर्णय नहीं लिया गया।
🏛️ सरकार का पक्ष
राज्य सरकार के अधिवक्ता ने देरी के लिए तर्क दिया कि ग्राम प्रधान और अन्य अधिकारियों की अनुपलब्धता के कारण आवेदनों पर विचार नहीं हो सका। हालांकि, सरकार ने यह आश्वासन भी दिया कि अभी तक किसी भी प्रकार की बेदखली की कार्रवाई नहीं की गई है।
📋 आदेश का संक्षिप्त विश्लेषण
| कोर्ट का निर्देश | शर्त / टिप्पणी |
| बेदखली पर रोक | जब तक वनाधिकार दावों का अंतिम फैसला न आ जाए। |
| कृषि कार्य | वन गुर्जर खेती जारी रख सकते हैं, वन विभाग हस्तक्षेप नहीं करेगा। |
| प्रतिबंध | व्यावसायिक या गैर-कृषि उपयोग पूरी तरह प्रतिबंधित। |
| निस्तारण | शासन को दावों का जल्द से जल्द कानूनी निस्तारण करने का निर्देश। |

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