कविता के जरिए न्याय की गूँज: अंकिता भंडारी की स्मृति में गोकुलानंद जोशी की कुमाऊँनी रचना ‘मेरी आत्मा की पुकार’ हुई वायरल
बिंदुखत्ता: उत्तराखंड की बेटी अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने की मुहिम अब गीतों और कविताओं के जरिए जनता के दिलों में फिर से सुलगने लगी है। बिंदुखत्ता निवासी कवि गोकुलानंद जोशी और रश्मि बिष्ट के स्वरों में सजी कविता ‘मेरी आत्मा की पुकार’ ने सोशल मीडिया पर लोगों की आँखों को नम कर दिया है।
कविता में तीन साल बीत जाने के बाद भी न्याय की धीमी प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं। कवि ने अपनी रचना में उत्तराखंड के लोक-देवताओं, विशेषकर न्याय के देवता गोल्ज्यू से यह मार्मिक विनती की है कि यदि यह वास्तव में देवभूमि है, तो यहाँ की बेटियों के साथ हो रहे अन्याय का अंत होना चाहिए।
यह कविता न केवल अंकिता की पीड़ा है, बल्कि उन हजारों चेलियों की आवाज़ है जो आज भी पहाड़ और भाभर के इलाकों में डर के साये में जी रही हैं।
✍️ मेरी आत्मा की पुकार
मेरी मनक अब एक पुकार छू,
मेरे मन मं बचि रै अब एक आस छू।
मीक आज तलक नि मिलो न्याय,
कब तलक मिलल मीक यो न्याय?
यो छू हमर देवतां की भूमि,
तब त कुंनी इगे देवभूमि?
कब तलक हुवल म्यार दोषियोंक खुलास,
कब टूटल झूठ-कपट को विश्वास ?
साल नक साल बीत गी ,
महिनक महीन भी बीत गी।
आज तलक नि हरय मीयर य खुलास,
फिर ले मनं मं जिंद छू एक आस।
गोल्ज्यू में अब एक आस छू,
न्याय करण ऊनको काम छू।
अब मेरी मनक एक गुहार छू,
हे देवता! मेरी बात स्वीकार छू।
मिन देह तो त्याग दी,
पर आत्माक आज ले अमर छू।
आज ले मीगे य आश छू,
मेरी आत्माक अब एक पुकार छू।
मेरी मनक अब एक पुकार छू,
सच क बाट में आज ले अंन्यार छू।
नेता झूठ बुले सकु, सरकार झूठ है सकं,
मगर सच कब तलक चुप र सकूं?
मगर हे माँ नंदा देवी,
तू अन्याय नी देख सकनी ।
और हे गोल्ज्यू देवता,
तू तो न्यायक देवता छा।
मेरी मन में आय ले एक आस छू
देर हें सकूं पर न्यायिक उमिद आय ले छू
मगर मीयर दगड़ इतुक अन्याय किलै?
म्यार कसूर की छू, बतै दे?
अगर तू साँच छ देवता,
तो म्यार यो पुकार अब सुणैलै।
मेरी इजू आज ले हाथ जोड़ी रूने,
हर रात मेरी याद में आँसूं मं डूबि रूने।
मेरी आत्मा हर पल तड़पैनें,
मेरी ईजा न्यायिक गूहार लगूनें।
म्यार जस हजारौं चेली आज ले डर मं छन,
हर दिन भाभर में रबेर घबराते रुनी ।
इज़्ज़ा और बाज्यू घर बे भैर भेजण में डरनी,
इन निर्दय गे देख बेर सब घबरानी,
हे देवतां की पावन धरती,
अब तो न्यायिक ज्योत जलें दे।
अगर तू साँच छ देव,
तो म्यार संग हइ अन्याय मिटा दे।
देख अगर तू साँच छ,
त म्यार यो पुकार सुण।
जल्द न्याय दिला दे देवता,
म्यार इजू की गुहार सुण।
यह कविता मात्र शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि देवभूमि की एक बेटी की आत्मा की व्यथा और न्याय के लिए उसके संघर्ष की प्रतिध्वनि है। गोकुलानंद जोशी जी की यह कुमाऊँनी रचना अंकिता भंडारी के साथ हुए अन्याय और तीन साल के लंबे इंतज़ार के बाद उपजे आक्रोश और विश्वास के मिश्रण को खूबसूरती से दर्शाती है।
प्रस्तुत है इस मार्मिक कविता पर एक संक्षिप्त विवरणात्मक लेख, जो इस पीड़ा और पुकार को और अधिक गहराई प्रदान करता है:
🖋️ साहित्यिक समीक्षा: ‘मेरी आत्मा की पुकार’
विषय: अंकिता भंडारी हत्याकांड और न्याय की अनवरत प्रतीक्षा। रचयिता: गोकुलानंद जोशी (बागेश्वर/बिंदुखत्ता)। स्वर: गोकुलानंद जोशी एवं रश्मि बिष्ट।
1. न्याय का आध्यात्मिक दृष्टिकोण (गोल्ज्यू और नंदा देवी)
कवि ने न्याय के लिए सांसारिक अदालतों और सरकारों से ऊपर उठकर देवभूमि के सर्वोच्च न्यायधीश ‘न्याय के देवता चितई गोल्ज्यू’ और ‘माँ नंदा’ की शरण ली है। कविता की पंक्तियाँ— “गोल्ज्यू में अब एक आस छू, न्याय करण ऊनको काम छू” — यह दर्शाती हैं कि जब व्यवस्था हार जाती है, तब पहाड़ी समाज अपने आराध्य देवों से न्याय की गुहार लगाता है।
2. माता-पिता की पीड़ा का मार्मिक चित्रण
कविता उस हृदयविदारक दृश्य को उकेरती है जहाँ एक माँ (इजू) आज भी अपनी बेटी की याद में हाथ जोड़कर रो रही है। “मेरी ईजा न्यायिक गूहार लगूनें” — यह पंक्ति केवल अंकिता की माँ की नहीं, बल्कि उत्तराखंड की हर उस माँ की है जो अपनी बेटियों की सुरक्षा के लिए चिंतित है।
3. सामाजिक भय और ‘हजारों अंकिताओं’ की सुरक्षा
कवि ने बहुत ही सक्षमता से समाज में व्याप्त वर्तमान डर को स्वर दिया है। आज पहाड़ की अन्य बेटियों (चेलियों) के मन में जो दहशत है, और माता-पिता जो उन्हें घर से बाहर भेजने में डरते हैं (इज़्ज़ा और बाज्यू घर बे भैर भेजण में डरनी), वह इस व्यवस्था पर एक करारा प्रहार है।
4. सत्य की अजेय शक्ति
कविता का मुख्य स्वर यह है कि नेता और सरकार झूठ बोल सकते हैं, लेकिन सत्य को लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता। अंकिता की देह तो त्याग दी गई, पर उसकी आत्मा आज भी न्याय के लिए अमर होकर देवभूमि के कण-कण में गूँज रही है।

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