उत्तराखंड में बिजली संकट: मार्च में उत्पादन गिरा और मांग ने तोड़ा रिकॉर्ड; 492 मिलियन यूनिट की भारी कमी, बाहरी खरीद से थमी ‘ब्लैक आउट’ की स्थिति

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देहरादून (30 मार्च 2026): ऊर्जा विभाग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, मार्च के दूसरे पखवाड़े में स्थिति सबसे अधिक गंभीर रही। उत्पादन में गिरावट और औद्योगिक मांग में उछाल ने पावर ग्रिड पर भारी दबाव डाला है।

1. मांग बनाम उपलब्धता: आंकड़ों की जुबानी

मार्च महीने के दौरान राज्य की बिजली व्यवस्था का गणित कुछ इस प्रकार रहा:

विवरण आंकड़े (मिलियन यूनिट – MU)
कुल बिजली मांग 1079.92 MU
कुल उपलब्धता (राज्य + केंद्र हिस्सा) 587.88 MU
कुल कमी (Shortfall) 492.03 MU
राज्य का अपना उत्पादन (मार्च) 218.30 MU
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2. 12 मार्च: महीने का सबसे कठिन दिन

मार्च के मध्य में संकट अपने चरम पर था। 12 मार्च को राज्य के पास अपनी उपलब्धता और मांग के बीच 21.53 MU की भारी कमी थी, जिसे पूरा करने के लिए सरकार को खुले बाजार (Energy Exchange) से 15.12 MU बिजली नकद खरीदनी पड़ी।

3. संकट के प्रमुख कारण

  • कम जलस्तर: नदियों में पानी कम होने से हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स का उत्पादन 6-7 MU प्रतिदिन तक सिमट गया।

  • बढ़ता तापमान: मार्च में ही गर्मी बढ़ने से पंखों और कूलरों का उपयोग शुरू हो गया।

  • औद्योगिक मांग: सिडकुल और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में बिजली की खपत में तेज उछाल दर्ज किया गया।

  • सिंचाई: मैदानी इलाकों में फसलों की सिंचाई के लिए ट्यूबवेलों का अत्यधिक प्रयोग।

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4. कैसे बुझाई गई राज्य की ‘प्यास’?

बिजली कटौती (Roastering) से बचने के लिए ऊर्जा विभाग ने दो मुख्य रास्तों का चुनाव किया:

  1. पावर एक्सचेंज: बाजार से 150.39 MU बिजली महंगी दरों पर खरीदी गई।

  2. बैंकिंग व्यवस्था: अन्य राज्यों से पुराने समझौते के तहत 341.02 MU बिजली उधार (Banking) ली गई।


उपभोक्ताओं पर सीधा असर: बिल में बढ़ोतरी तय

जैसा कि पहले बताया गया है, महंगी दरों पर बिजली खरीदने का वित्तीय बोझ उपभोक्ताओं पर ही पड़ेगा।

नोट: यही कारण है कि 1 अप्रैल 2026 से उत्तराखंड में FPPCA (फ्यूल सरचार्ज) लागू किया गया है, जिससे घरेलू उपभोक्ताओं को 0.11 से 0.31 रुपये और उद्योगों को 0.41 रुपये प्रति यूनिट तक अतिरिक्त भुगतान करना होगा।