अलविदा ‘दीवान दा’: कुमाऊंनी लोकगायक दीवान कनवाल का निधन; लोकसंगीत के एक स्वर्णिम युग का अंत

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अल्मोड़ा (11 मार्च 2026): अल्मोड़ा के खत्याड़ी निवासी और विख्यात कुमाऊंनी लोकगायक दीवान कनवाल का बुधवार सुबह उनके पैतृक आवास पर निधन हो गया। 65 वर्षीय कनवाल पिछले कुछ समय से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे थे। उनके निधन की खबर फैलते ही पूरे प्रदेश के कलाकारों और प्रशंसकों में शोक की लहर दौड़ गई है।

1. अंतिम समय और संघर्ष

  • उपचार: दीवान कनवाल पिछले कुछ समय से बीमार थे और हल्द्वानी के एक निजी अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था।

  • सर्जरी: हाल ही में उनका एक ऑपरेशन भी हुआ था, जिसके बाद वे स्वस्थ होकर घर लौटे थे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था और बुधवार सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली।

  • अंतिम संस्कार: उनका अंतिम संस्कार आज दोपहर बाद अल्मोड़ा के बेतालेश्वर घाट पर किया जाएगा, जहाँ उन्हें अंतिम विदाई दी जाएगी।

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2. 35 वर्षों का सांस्कृतिक सफर

दीवान कनवाल केवल एक गायक नहीं, बल्कि कुमाऊंनी लोकसंस्कृति के संरक्षक थे। उन्होंने साढ़े तीन दशकों से अधिक समय तक अपनी आवाज से पहाड़ की पीड़ा, प्रेम और परंपराओं को जीवंत रखा।

  • प्रसिद्ध गीत: उनके द्वारा गाए गए गीत आज भी हर पहाड़ी की जुबान पर रहते हैं। इनमें शामिल हैं:

    • ‘दाज्यु हमार जवाई रिषे ग्ये’ (हास्य और व्यंग्य का बेजोड़ मेल)

    • ‘आज कुछे मैत जा’

    • ‘कस भिड़े कुनई पंडित ज्यू कस करछा ब्या’

    • ‘ह्यू भरी डाना’

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3. परिवार और व्यक्तित्व

स्नेह से ‘दीवान दा’ पुकारे जाने वाले कनवाल अपने पीछे अपनी वृद्ध माता, दो विवाहित पुत्रों और दो पुत्रियों का भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनकी पत्नी का निधन कुछ वर्ष पूर्व ही हो गया था। सरल स्वभाव के धनी दीवान दा नए उभरते कलाकारों के लिए हमेशा एक मार्गदर्शक की भूमिका में रहे।


Snapshot: दीवान कनवाल का जीवन-वृत्त

विवरण जानकारी
नाम दीवान कनवाल (दीवान दा)
आयु 65 वर्ष
निवासी खत्याड़ी गांव, अल्मोड़ा
पेशा/योगदान लोकगायक एवं सांस्कृतिक कर्मी (35+ वर्ष)
प्रसिद्ध रचना दाज्यु हमार जवाई रिषे ग्ये
अंतिम संस्कार बेतालेश्वर घाट, अल्मोड़ा
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श्रद्धांजलि: दीवान कनवाल का जाना कुमाऊंनी संगीत जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उनके गीतों की गूँज हिमालय की वादियों में हमेशा जीवंत रहेगी।

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