हल्दूचौड़-बिंदुखत्ता हाथी कॉरिडोर: 4 लाख घन मीटर मलबे के ढेर से संकट; सर्वे रिपोर्ट पर एक साल से ‘सरकारी’ चुप्पी
हल्द्वानी: कॉर्बेट-राजाजी पार्क से नेपाल तक हाथियों के आवागमन के मुख्य रास्ते (हाथी कॉरिडोर) पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। हल्दूचौड़ और बिंदुखत्ता के बीच गौला नदी के करीब 2.5 किलोमीटर लंबे हिस्से में लगभग 4 लाख घन मीटर रेत-बजरी (RBM) जमा हो गई है, जिससे न केवल वन्यजीवों का रास्ता रुक रहा है, बल्कि स्थानीय किसानों की जमीन भी तबाह हो रही है।
⚠️ हाथी कॉरिडोर पर ‘आरबीएम’ का पहाड़: प्रमुख खतरे
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हाथियों का रास्ता प्रभावित: यह क्षेत्र हाथियों के नेपाल जाने का प्रमुख मार्ग है। मलबे के ऊंचे ढेरों के कारण हाथियों को आवाजाही में भारी परेशानी हो रही है।
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बढ़ता मानव-वन्यजीव संघर्ष: रास्ता बाधित होने से हाथी आबादी वाले क्षेत्रों का रुख कर सकते हैं, जिससे जान-माल के नुकसान का खतरा बढ़ गया है।
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भू-कटाव से किसान परेशान: नदी में जमा मलबे के कारण पानी का रुख गांवों की ओर मुड़ रहा है। इससे आधा दर्जन से अधिक गांवों की उपजाऊ कृषि भूमि का लगातार कटाव हो रहा है।
📋 सर्वे के एक साल बाद भी कार्रवाई का इंतजार
ग्रामीणों के भारी विरोध के बाद पिछले साल मई में वन निगम, वन विभाग, सिंचाई, राजस्व, खान विभाग और जियोलॉजिकल सर्वे की संयुक्त टीम ने सर्वे किया था।
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प्रस्ताव: रिपोर्ट में नदी को चैनलाइज (Channelize) करने या जमे हुए आरबीएम को हटाने का स्पष्ट प्रस्ताव दिया गया था।
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वर्तमान स्थिति: सर्वे रिपोर्ट शासन को भेजे एक साल से ज्यादा समय बीत चुका है, लेकिन फाइल अभी भी केंद्र सरकार की अनुमति के इंतजार में दबी हुई है।
⚖️ अधिकारियों और विशेषज्ञों का पक्ष
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धीरेश बिष्ट (DLM, वन निगम): उन्होंने पुष्टि की कि 6 विभागों की संयुक्त सर्वे रिपोर्ट शासन को भेजी जा चुकी है। अब केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से अनुमति मिलने के बाद ही कोई काम शुरू हो पाएगा।
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विशेषज्ञों की चेतावनी: जानकारों का कहना है कि यदि जल्द ही चैनलाइजेशन नहीं किया गया, तो आने वाले मॉनसून में स्थिति और अधिक विकट हो सकती है। आरबीएम हटने से जैव-विविधता का संरक्षण होगा और किसानों की भूमि सुरक्षित होगी।
🏘️ प्रभावित क्षेत्र की मुख्य मांग
स्थानीय ग्रामीण और पर्यावरण प्रेमी शासन से तत्काल निर्णय लेने की मांग कर रहे हैं ताकि:
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हाथियों का कॉरिडोर सुरक्षित हो सके।
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कृषि भूमि को भू-कटाव से बचाया जा सके।
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नदी का प्राकृतिक प्रवाह बहाल हो।

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