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मां, भाई और गर्भवती भाभी के कातिल की फांसी की सजा पर सुनवाई टली, कोर्ट ने मांगी मेडिकल रिपोर्ट

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नैनीताल:

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने अपनी मां, बड़े भाई और गर्भवती भाभी की तलवार से काटकर निर्मम हत्या करने वाले अभियुक्त संजय सिंह को ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई फांसी की सजा के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई की। माननीय न्यायाधीश न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ ने मामले में आंशिक सुनवाई करते हुए अगली सुनवाई के लिए 21 जुलाई की तिथि निर्धारित की है।

हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से मांगा मेडिकल रिकॉर्ड

खंडपीठ ने इस मामले में राज्य सरकार को अभियुक्त के संबंध में पेश किए गए संपूर्ण रिकॉर्ड का बारीकी से अवलोकन करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि क्या घटना के वक्त अभियुक्त किसी गंभीर मानसिक या शारीरिक बीमारी से ग्रसित था, जिसके कारण उसने आवेश में आकर इस खौफनाक वारदात को अंजाम दिया?

इससे पहले हाई कोर्ट ने फांसी की सजा के फैसले पर अभियुक्त की सटीक मेडिकल स्थिति जानने के लिए मामले को दोबारा सुनवाई हेतु विचारणीय अदालत (ट्रायल कोर्ट) को भेजा था। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने मामले की पुनर्सुनवाई के बाद अभियुक्त को पूरी तरह स्वस्थ पाते हुए उसकी फांसी की सजा को बरकरार रखा था। ट्रायल कोर्ट का मानना था कि अभियुक्त ने अपनी मां के गर्भ में पल रहे एक बेजुबान बच्चे सहित परिवार के तीन सदस्यों की बेरहमी से हत्या की है, इसलिए वह मृत्युदंड का ही हकदार है।

क्या है पूरा मामला?

यह दिल दहला देने वाली घटना 13 दिसंबर 2014 की है। टिहरी गढ़वाल के गुमाल गांव के रहने वाले संजय सिंह ने मामूली विवाद के बाद अपनी मां, बड़े भाई और गर्भवती भाभी पर तलवार से हमला कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया था। घटना के बाद अभियुक्त के पिता राम सिंह पंवार ने पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराई थी। अगस्त 2021 में जिला एवं सत्र न्यायाधीश टिहरी गढ़वाल ने संजय सिंह को दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई थी, जिसे अभियुक्त ने हाई कोर्ट में चुनौती दी है।

न्याय मित्र (अमीकस क्यूरी) ने दी मानसिक अस्वस्थता की दलील

हाई कोर्ट द्वारा अभियुक्त की पैरवी के लिए नियुक्त किए गए वरिष्ठ अधिवक्ता और न्याय मित्र अरविंद वशिष्ठ ने अदालत को बताया कि मृत्युदंड की सजा पा चुका अभियुक्त मानसिक रूप से अस्वस्थ है। उन्होंने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि बोर्ड ने भी अभियुक्त को मानसिक रूप से बीमार माना था और कहा था कि वह अपने कृत्य के परिणामों को समझने की स्थिति में नहीं था।

न्याय मित्र ने दलील दी कि इलाज के बाद अभियुक्त की स्थिति में सुधार हो सकता है, लेकिन विचारण अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने इस महत्वपूर्ण तथ्य को नजरअंदाज करते हुए उसे सीधे फांसी की सजा सुना दी। अब इस संवेदनशील मामले की अगली कड़ाई से सुनवाई 21 जुलाई को होगी।

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