बिन कप्तान के ‘न्याय के मंदिर’ में फरियादियों की कतार, लालकुआं तहसील में रोज मिलता है फरमान – “कल आना”

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राजू अनेजा,लालकुआं। कभी वीआईपी मानी जाने वाली विधानसभा सीट आज अपनी ही तहसील में बेसहारा नजर आ रही है। दोपहर 12:30 बजे का वक्त… तहसील परिसर में कुर्सियां खाली, दफ्तरों के दरवाजे खुले, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी नदारद। और मुख्य गेट के पास जमीन पर बैठा एक बुजुर्ग—बंद लाल। कमजोर काया, सफेद बाल और चेहरे पर बेबसी की झुर्रियां। पास ही उनका दिव्यांग पुत्र गुरुदेव व्हीलचेयर पर चुपचाप बैठा हर आती-जाती गाड़ी की ओर उम्मीद भरी नजरों से देखता रहा।
हर शख्स से एक ही सवाल—“साहब आए क्या?”
और हर बार वही जवाब—“नहीं।”
बंद लाल सुबह से अपने बेटे की पेंशन के कागजात लेकर बैठे थे। “कुछ बोल भी नहीं सकते, वरना काम अटक जाएगा…” उनकी यह बात सिस्टम के डर और लाचारी दोनों को बयां कर गई।

 

दो लाख की आबादी, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं

करीब दो लाख की आबादी वाली लालकुआं तहसील कई दिनों से अधिकारियों की गैरमौजूदगी से जूझ रही है। तहसीलदार 21 फरवरी तक और एसडीएम 2 मार्च तक अवकाश पर बताए जा रहे हैं। एसडीएम के अवकाश पर होने से कोर्ट भी नहीं लग पा रही। प्रभार हल्द्वानी के उपजिलाधिकारी को सौंपा गया, लेकिन वे भी छुट्टी पर हैं। नतीजा—ऑनलाइन प्रमाणपत्र अटके, सत्यापन लंबित और फरियादी दिनभर भटकने को मजबूर।
शुक्रवार को समाज कल्याण विभाग के अधिकारी भी नहीं पहुंचे। पेंशन, विधवा, दिव्यांग और स्थायी प्रमाणपत्र के काम ठप पड़े रहे। सहायक समाज कल्याण अधिकारी पूजा ने बताया कि वे नशामुक्ति केंद्र की जांच में थीं और 18 फरवरी को तहसील आएंगी। ग्राम विकास अधिकारी भी कई सप्ताह से नियमित रूप से नहीं बैठ रहीं।

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सूचना नहीं, नोटिस नहीं… बस इंतजार

सबसे हैरानी की बात यह कि सूचना पट पर अवकाश की कोई स्पष्ट जानकारी नहीं। दूरदराज से आने वाले लोग किराया-भाड़ा खर्च कर घंटों इंतजार करते हैं और अंत में खाली हाथ लौट जाते हैं। कई बार कर्मचारियों को भी नहीं पता होता कि किस दिन कौन अधिकारी उपलब्ध रहेगा।
शारदा देवी बताती हैं, “मैं विधवा प्रमाणपत्र के सत्यापन के लिए कई बार चक्कर लगा चुकी हूं, लेकिन अधिकारी नहीं आते।”बंद लाल की पीड़ा भी यही कहती है—“दिव्यांग बेटे कीपेंशन के कागज जमा नहीं हो पाए।”

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सोशल मीडिया में लोकप्रिय, धरातल पर जीरो नेताजी

 

स्थानीय जनप्रतिनिधियों की “उपलब्धियों” के किस्से उनके समर्थक सोशल मीडिया पर दिन-रात गाते नहीं थकते। पोस्ट, रील, लाइव और बधाइयों की झड़ी—सब कुछ चमकदार दिखता है। लेकिन जब बात धरातल की आती है तो तस्वीर बिल्कुल उलट नजर आती है।
कभी वीआईपी श्रेणी में गिने जाने वाला लालकुआं विधानसभा क्षेत्र आज बुनियादी व्यवस्थाओं के लिए तरस रहा है। तहसील में अधिकारी नहीं, प्रमाणपत्र लंबित, पेंशन अटकी, कोर्ट नहीं लग रही—और जनता घंटों लाइन में खड़ी रहकर “कल आना” का फरमान सुन रही है।
सोशल मीडिया पर सक्रिय जनप्रतिनिधियों की टाइमलाइन लोकप्रियता से भले भरी हो, लेकिन जनता के काम की फाइलें खाली पड़ी हैं। सवाल यह है कि आखिर लोकप्रियता का पैमाना लाइक और शेयर हैं या फिर लोगों की समस्याओं का समाधान?
लोग पूछ रहे हैं—
क्या सिर्फ डिजिटल मौजूदगी ही जनसेवा है?
क्या धरातल पर जवाबदेही खत्म हो चुकी है?
और सबसे बड़ा सवाल—
आखिर लालकुआं की जनता अपनी पीड़ा किसे सुनाए?
जनता को अब पोस्ट नहीं, परिणाम चाहिए। तस्वीरें नहीं, व्यवस्था चाहिए।
क्योंकि लोकतंत्र में नेता की असली परीक्षा सोशल मीडिया नहीं, बल्कि जनता की चौखट पर होती है।

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अब बड़ा सवाल यह है कि क्या जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि इस बदहाल व्यवस्था का संज्ञान लेंगे? या फिर लालकुआं की जनता को यूं ही रोज सुनना पड़ेगा—
“आज नहीं… कल आना।”

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