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सलाखों के पीछे आई पिता की मौत की खबर, अंतिम विदाई के लिए पॉक्सो आरोपी बेटे को कोर्ट से मिली इजाजत

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हल्द्वानी जेल में निरुद्ध कबीर ने पिता सुखराम के अंतिम संस्कार में शामिल होने की मांगी थी अनुमति, अदालत ने मानवीय आधार पर दी राहत

राजू अनेजा,काशीपुर। पिता की मौत की खबर जब जेल की सलाखों के पीछे बंद बेटे तक पहुंची तो उसके सामने जिंदगी का सबसे भावुक और कठिन क्षण आ खड़ा हुआ। एक ओर गंभीर मुकदमे में न्यायिक हिरासत और दूसरी ओर पिता की अंतिम विदाई। ऐसे में पॉक्सो एक्ट के मामले में हल्द्वानी जेल में निरुद्ध कबीर ने अपने पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने उसके प्रार्थना पत्र पर विचार करते हुए उसे पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होने की अनुमति दे दी।

 

पिता की मौत की खबर ने जेल में बंद बेटे को झकझोरा

दस्तावेज के अनुसार कबीर पुत्र सुखराम, निवासी जोशी का मझरा, थाना आईटीआई, जिला ऊधम सिंह नगर एक मामले में हल्द्वानी जेल में निरुद्ध है। इसी बीच 29 सितंबर 2026 की दोपहर उसके पिता सुखराम का निधन हो गया।

पिता के निधन की सूचना मिलने के बाद कबीर की ओर से अधिवक्ता संजीव कुमार आकाश ने अदालत में प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया। प्रार्थना पत्र में कहा गया कि पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होना उसके लिए बेहद आवश्यक है और उसे पुलिस अभिरक्षा में अंतिम संस्कार में शामिल होने की अनुमति प्रदान की जाए।

 

एक तरफ मुकदमा, दूसरी तरफ पिता की अंतिम विदाई

कबीर के खिलाफ आईटीआई थाने में एफआईआर संख्या 224/2026 दर्ज है। दस्तावेज में मामले में धारा 64(1), 137(2) बीएनएसएस तथा धारा 5/6 पॉक्सो एक्ट का उल्लेख किया गया है। मामले में वह न्यायिक हिरासत में है।

कानूनी प्रक्रिया अपनी जगह चल रही है, लेकिन पिता की मृत्यु ने उसके सामने एक अलग ही परिस्थिति खड़ी कर दी। जेल में रहते हुए उसे अपने पिता को अंतिम बार देखने और अंतिम संस्कार में शामिल होने की चिंता सताने लगी। इसी भावनात्मक परिस्थिति को लेकर अदालत से राहत मांगी गई।

 

पुलिस अभिरक्षा में अंतिम संस्कार में होगा शामिल

प्रार्थना पत्र में अदालत से अनुरोध किया गया था कि कबीर को पुलिस अभिरक्षा में उसके पिता के अंतिम संस्कार में शामिल कराया जाए तथा इस संबंध में सब-जेल अधीक्षक हल्द्वानी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ऊधम सिंह नगर-रुद्रपुर को आवश्यक आदेश दिए जाएं।

अदालत की अनुमति के बाद अब जेल में निरुद्ध कबीर को अपने पिता की अंतिम विदाई में शामिल होने का अवसर मिलेगा।

 

जिस पिता से मिलने को तरस रहा था बेटा, अब अंतिम बार देखेगा

पिता और बेटे का रिश्ता जिंदगी के सबसे गहरे रिश्तों में माना जाता है। परिस्थितियां चाहे जैसी हों, पिता की अंतिम विदाई का क्षण किसी भी बेटे के लिए बेहद पीड़ादायक होता है। कबीर के मामले में यह पीड़ा इसलिए और गहरी हो गई कि वह अपने पिता की मृत्यु के समय जेल की चारदीवारी के भीतर था।

अब पुलिस सुरक्षा के बीच वह अपने पिता के अंतिम संस्कार में पहुंचेगा। एक बेटे के लिए यह मुलाकात आखिरी होगी—जहां शब्द नहीं होंगे, सिर्फ पिता को अंतिम विदाई देने का दर्द होगा।

 

मुकदमा अपनी जगह, पिता की अंतिम विदाई अपनी जगह

इस पूरे मामले में न्यायिक प्रक्रिया अपने स्थान पर है और आरोपों का निर्धारण न्यायालय में होने वाली प्रक्रिया के अनुसार होगा। फिलहाल इस घटना का सबसे मार्मिक पहलू यही है कि जिस बेटे के हाथ कानून ने बांध रखे थे, उसे पिता की अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए अदालत की अनुमति का सहारा लेना पड़ा।

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