दिल्ली में जनहित की आंच में पक रही सियासी खिचड़ी !गदरपुर से राजधानी तक बढ़ी हलचल

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राजू अनेजा, नई दिल्ली / देहरादून / गदरपुर।उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों एक सवाल तैर रहा है — क्या जनहित के मुद्दों की आड़ में दिल्ली में कोई सियासी खिचड़ी पक रही है?
गदरपुर विधायक अरविंद पांडे का हालिया दिल्ली दौरा इसी वजह से चर्चा के केंद्र में है। आधिकारिक तौर पर दौरे का मकसद उधम सिंह नगर के रेलवे परिसरों में छोटे दुकानदारों पर बढ़ाए गए किराए का मुद्दा बताया गया। लेकिन सियासत में टाइमिंग ही सबसे बड़ा संकेत होती है।

 

दिल्ली दरबार में बढ़ी सक्रियता

सूत्रों के मुताबिक पांडे ने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट से मुलाकात के बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष नवीन से भी भेंट की।
इसके अलावा रेल भवन में केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव से बैठक में सांसद अनिल बलूनी और पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत  की मौजूदगी ने सियासी हलकों में नई चर्चा को जन्म दिया है।

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मुद्दा जनहित का, समय सियासत का

उधम सिंह नगर के काशीपुर, बाजपुर, गूलरभोज, किच्छा, बनबसा और टनकपुर के रेलवे परिसरों में छोटे दुकानदारों पर कई गुना किराया बढ़ाए जाने का मामला अचानक सुर्खियों में आया। स्थानीय स्तर पर विरोध की आवाजें उठीं तो यह मुद्दा दिल्ली तक पहुंचा।
सूत्रों के अनुसार इसी सिलसिले में रेल भवन में केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव से विस्तृत चर्चा की गई। बैठक में सांसद अनिल बलूनी और पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की मौजूदगी ने इसे और राजनीतिक वजन दे दिया।
बताया गया कि बढ़ी हुई किराया दरों पर रोक लगाने और पुनः समीक्षा के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही पुराने किराये पर सीमित वृद्धि का प्रस्ताव भी रखा गया।

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सवाल जो सियासत पूछ रही है

 

क्या यह सिर्फ किराया वृद्धि का समाधान था?
या फिर संगठनात्मक समीकरण साधने की बिसात?क्या 2027 से पहले टिकट और नेतृत्व को लेकर अंदरूनी तैयारी चल रही है?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी साल में दिल्ली की दस्तक यूं ही नहीं होती। हर सक्रियता के पीछे एक रणनीति छिपी होती है — चाहे वह जनहित की ढाल में ही क्यों न हो।

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निष्कर्ष अभी अधूरा

पांडे समर्थकों का कहना है कि दौरा पूरी तरह क्षेत्रीय समस्याओं के समाधान के लिए था। वहीं विपक्ष इसे “जनहित की आंच में सियासी तड़का” बता रहा है।
फिलहाल तस्वीर धुंधली है, पर आंच तेज है।
दिल्ली में जो पक रहा है, उसकी तपिश अब प्रदेश की राजनीति तक महसूस की जा रही है।
आने वाले दिनों में यही तय करेगा — यह सिर्फ राहत की रेसिपी थी या सियासी समीकरणों की नई डिश।

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